February 20, 2026
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Aligarh News: बिना दवा, बिना साइड इफेक्ट्स सोरायसिस का इलाज

  • June 5, 2025
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Last Updated:June 05, 2025, 13:46 IST Aligarh Latest News: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तिब्बिया कॉलेज में प्रोफेसर आसिया सुल्ताना की टीम ने जोंक थेरेपी से 50 मरीजों का

Aligarh News: बिना दवा, बिना साइड इफेक्ट्स सोरायसिस का इलाज

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Aligarh Latest News: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तिब्बिया कॉलेज में प्रोफेसर आसिया सुल्ताना की टीम ने जोंक थेरेपी से 50 मरीजों का सफल इलाज किया, जिससे सोरायसिस और अन्य गंभीर बीमारियों में राहत मिली है.

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प्रोफ़ेसर

प्रोफ़ेसर आसिया सुल्ताना

हाइलाइट्स

  • अलीगढ़ में जोंक थेरेपी से सोरायसिस का इलाज हो रहा है.
  • तिब्बिया कॉलेज में 50 मरीजों पर जोंक थेरेपी सफल रही.
  • जोंक थेरेपी में दवा की जरूरत नहीं, संक्रमित खून चूसती है.

अलीगढ़: जब आधुनिक चिकित्सा इलाजों से मरीज निराश हो जाते हैं और रोग ठीक होने का कोई आसार नहीं दिखता, तब पारंपरिक उपचार पद्धतियां जैसे यूनानी चिकित्सा की जोंक थेरेपी नई उम्मीद की किरण बनकर सामने आती हैं. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तिब्बिया कॉलेज में जोंक थेरेपी पर तीव्र शोध और प्रयोग चल रहे हैं. यहां की प्रोफेसर आसिया सुल्ताना और उनकी टीम ने 18 से 55 वर्ष की उम्र के 50 मरीजों पर इस थेरेपी का सफलतापूर्वक उपयोग कर सोरायसिस जैसे जटिल त्वचा रोग का इलाज किया है. आश्चर्य की बात यह है कि सभी मरीज इस उपचार से पूरी तरह स्वस्थ हो गए, जो इस क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.

बिन दवाइयों के मिल रही राहत
प्रोफेसर आसिया सुल्ताना ने बताया कि सोरायसिस एक गंभीर चर्म रोग है, जिसमें त्वचा पर लाल, खुरदरे चकत्ते या छोटे-छोटे धब्बे उभर आते हैं. यह बीमारी शरीर के उन हिस्सों को प्रभावित करती है जहां त्वचा की परतें पतली होती हैं, जैसे कि बगल, कमर, घुटने और स्तनों के नीचे. सोरायसिस न केवल शारीरिक कष्ट देती है, बल्कि मानसिक तनाव और पीड़ा का भी कारण बनती है. इस बीमारी से पीड़ित मरीजों ने पहले कई बार आधुनिक अंग्रेजी दवाइयों का इस्तेमाल किया, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली. वहीं, यूनानी चिकित्सा की यह पुरानी लेकिन प्रभावशाली तकनीक, जिसे आम भाषा में जोंक थेरेपी कहा जाता है, उनके लिए वरदान साबित हुई.

प्राकृतिक तरीके से काम करती है ये थेरेपी
जोंक थेरेपी की खास बात यह है कि इसमें किसी भी तरह की दवा नहीं ली जाती. इस प्रक्रिया में जोंक को उस क्षेत्र पर लगाया जाता है जहां रोग या संक्रमण सबसे ज्यादा होता है. जोंक उस संक्रमित जगह से गंदा रक्त चूसती है, जिससे रक्त संचार बेहतर होता है और रोग की जड़ कमजोर पड़ने लगती है. 15 से 20 मिनट की इस प्रक्रिया के बाद जोंक अपने आप शरीर से अलग हो जाती है. इस तरह यह थेरेपी न केवल रोग के लक्षणों को कम करती है, बल्कि शरीर को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ होने में मदद भी करती है.

गांठ, सिस्ट ट्यूमर में भी कारगर
प्रोफेसर आसिया सुल्ताना के अनुसार, यह चिकित्सा पद्धति केवल सोरायसिस तक सीमित नहीं है, बल्कि गांठ, ट्यूमर और सिस्ट जैसी गंभीर बीमारियों में भी अत्यंत लाभकारी साबित हो रही है. यूनानी चिकित्सा की यह विधि एक बार फिर साबित कर रही है कि यदि सही तरीके से अपनाई जाए, तो पारंपरिक ज्ञान आधुनिक चिकित्सा की कई समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकता है. विज्ञान और परंपरा के इस मिलन से न केवल रोगों का उपचार संभव हो पाया है, बल्कि यह उन लोगों के लिए भी नई उम्मीद लेकर आया है जो आधुनिक इलाजों की विफलता और निराशा से हार चुके थे.
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