कच्छ में हड़प्पा से भी पुरानी सभ्यता के सबूत, मौजूद थीं शिकारी-घुमंतू बस्तियां
- June 5, 2025
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अहमदाबाद: भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित कच्छ क्षेत्र को अब तक हड़प्पा सभ्यता से जोड़कर देखा जाता रहा. लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिसर्च ने
अहमदाबाद: भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित कच्छ क्षेत्र को अब तक हड़प्पा सभ्यता से जोड़कर देखा जाता रहा. लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिसर्च ने
अहमदाबाद: भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित कच्छ क्षेत्र को अब तक हड़प्पा सभ्यता से जोड़कर देखा जाता रहा. लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिसर्च ने इस क्षेत्र के इतिहास को पूरी तरह से हिला दिया है. IIT गांधीनगर की अगुआई में हुई एक स्टडी के अनुसार, कच्छ में इंसानी मौजूदगी हड़प्पा काल से भी कम-से-कम 5,000 साल पहले की है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, IIT गांधीनगर, IIT कानपुर, IUAC दिल्ली और PRL अहमदाबाद के एक्सपर्ट्स की इस संयुक्त टीम ने कच्छ में शेल-मिडन साइट्स की पहचान की है. शेल-मिडन का मतलब है ऐसे स्थान जहां इंसानों द्वारा खाए गए शंखों के ढेर मिलते हैं. ये स्थल अब तक केवल समुद्री खाड़ी क्षेत्रों में ही पाए जाते थे, लेकिन अब कच्छ में इनका मिलना इस बात का प्रमाण है कि यहां हजारों साल पहले समुद्री जीवों पर निर्भर शिकारी-घुमंतू समुदाय रहते थे.
इन शेल नमूनों की उम्र जानने के लिए वैज्ञानिकों ने Accelerator Mass Spectrometry (AMS) तकनीक का इस्तेमाल किया. यह कार्बन-14 के क्षय (decay) की दर मापकर जीवाश्म की उम्र का अनुमान लगाती है. साथ ही, इन नतीजों को पेड़ के छालों की वार्षिक रिंग्स के डेटा से कैलिब्रेट किया गया.
इस स्टडी के दौरान रिसर्चर्स को विभिन्न प्रकार के पत्थर के औजार भी मिले, जिनका इस्तेमाल काटने, खुरचने और तोड़ने के लिए किया जाता था. जिन कच्चे पत्थरों से ये औजार बनाए गए थे, उनके अवशेष भी मिले हैं. इससे साफ होता है कि यहां के निवासी औजार निर्माण में कुशल थे और उन्होंने स्थानीय संसाधनों का बखूबी उपयोग किया.
इस रिसर्च के सबसे महत्वपूर्ण नतीजों में से एक यह है कि कच्छ में सभ्यता का विकास अचानक किसी बाहरी प्रभाव से नहीं हुआ, बल्कि यह एक लंबी स्थानीय प्रक्रिया का नतीजा है. प्रो. वी.एन. प्रभाकर के अनुसार, ‘इस क्षेत्र की भूगोल, जल संसाधनों और नेविगेशन की जो स्थानीय समझ इन प्राचीन समुदायों में विकसित हुई थी, वही बाद में हड़प्पा सभ्यता को दीर्घकालिक व्यापार और बेहतर नगरीय नियोजन की नींव देने में सहायक बनी.’
शेल-मिडन और उनके अवशेष न केवल संस्कृति की स्टडी में, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक ट्रेंड्स को समझने में भी कारगर हो सकते हैं. कच्छ में स्थित खदिर द्वीप पर पूर्व में किए गए अध्ययनों से पिछले 11,500 वर्षों की जलवायु का नक्शा तैयार किया गया था. नई साइट्स के एनालिसिस से उस नक्शे में और भी बारीक जानकारियां जुड़ सकती हैं.
डॉ. राय कहती हैं, ‘हमारे पूर्वज बिना आधुनिक तकनीक के भी विभिन्न पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करते हुए संतुलन में जीवन जीते थे. आज की जलवायु चुनौती के संदर्भ में, हमें उनके अनुकूलन के तरीकों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है.’
