February 20, 2026
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दीवार मेरी कॉपी थी, कोयला मेरी पेंसिल…पढ़िए बूटी देवी की इंस्पिरेशनल जर्नी!

  • June 2, 2025
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Last Updated:June 02, 2025, 22:40 IST Chitrakoot Latest News: चित्रकूट की बूटी देवी ने गरीबी और अनपढ़ता के बावजूद शिक्षा की मशाल जलाकर ‘शिक्षा दीदी’ के नाम से

दीवार मेरी कॉपी थी, कोयला मेरी पेंसिल…पढ़िए बूटी देवी की इंस्पिरेशनल जर्नी!

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Chitrakoot Latest News: चित्रकूट की बूटी देवी ने गरीबी और अनपढ़ता के बावजूद शिक्षा की मशाल जलाकर ‘शिक्षा दीदी’ के नाम से पहचान बनाई. पति के निधन के बाद भी बच्चों को पढ़ाना जारी रखा और समाजसेवी संस्था से जुड़कर …और पढ़ें

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बच्चों को पढ़ाती बूटी देवी

हाइलाइट्स

  • बूटी देवी ने कोयले से दीवारों पर लिखकर पढ़ाई की.
  • पति के निधन के बाद भी बच्चों को पढ़ाना जारी रखा.
  • समाजसेवी संस्था के सहयोग से प्री-प्राइमरी बच्चों को पढ़ाती हैं.

चित्रकूट: जब जज्बा हो तो रास्ते की हर मुश्किल आसान हो जाती है. ऐसी ही कहानी है चित्रकूट जिले के मानिकपुर ब्लॉक के पाठा क्षेत्र की बूटी देवी की, जो गरीबी और अनपढ़ता की कड़वी हकीकत को झेलकर आज सैकड़ों गरीब बच्चों के जीवन में शिक्षा की उजली किरण बन गई हैं. पढ़ाई का जुनून उन्हें ‘शिक्षा दीदी’ के नाम से पहचान दिला चुका है, और अब उनका नाम पूरे क्षेत्र में सम्मान से लिया जाता है.

कोयले से दीवारों पर लिखकर पढ़ाई की शुरुआत
गरीब परिवार में जन्मी बूटी देवी कभी स्कूल नहीं जा सकीं, लेकिन पढ़ने की चाहत इतनी मजबूत थी कि वे चूल्हे की आग से निकले कोयले से दीवारों और जमीन पर अक्षर बनाकर अभ्यास करती थीं. 13 साल की कम उम्र में उनकी शादी हो गई, पति खेत में मजदूरी करते थे, लेकिन कठिनाइयों के बावजूद बूटी देवी ने अपनी पढ़ाई का सपना नहीं छोड़ा. ससुराल पहुंचने के बाद भी वे लकड़ी के चूल्हे से निकले कोयले से अक्षर लिखने लगीं. यह बात उनके जेठ को पसंद नहीं आई, लेकिन पति ने उनका पूरा साथ दिया और स्लेट, पेंसिल और किताबें दिलाकर उनकी शिक्षा का रास्ता आसान किया. धीरे-धीरे बूटी देवी ने खुद ही प्राथमिक शिक्षा पूरी की.

पति के निधन के बाद भी नहीं हारी हिम्मत
जब पति का निधन हो गया, तो बूटी देवी पूरी तरह अकेली हो गईं. लेकिन इस मुश्किल घड़ी में भी उन्होंने हार नहीं मानी. अपने गांव में वे बच्चों को इकट्ठा करके पढ़ाने लगीं. वे बच्चे जिन्हें उनके माता-पिता सुबह मजदूरी पर भेज देते थे और पूरा दिन बिना कुछ किए भटकते रहते थे. बूटी देवी ने उन्हें पढ़ाने का जिम्मा उठाया और उनका प्रयास रंग लाने लगा. जिसके बाद आसपास के अन्य गांवों से भी बच्चे उनके पास आने लगे.

समाजसेवी संस्था का सहयोग और नई पहचान
बूटी देवी के काम को देखकर चाइल्ड फंड इंडिया नामक समाजसेवी संस्था ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया. अब वे संस्था में प्री-प्राइमरी बच्चों को पढ़ाती हैं और इसी से अपना घर चलाती हैं. साथ ही, गांव की महिलाएं भी उनके पास आती हैं ताकि वे उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक कर सकें और सामाजिक शोषण से लड़ने की ताकत दे सकें. बूटी देवी आज उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो अभावों और संघर्षों के बीच भी अपने सपनों को सच करना चाहती हैं.

आज की ‘शिक्षा दीदी’ का संदेश
बूटी देवी ने साबित कर दिया है कि अगर इरादा मजबूत हो तो गरीबी, अनपढ़ता और सामाजिक बंधनों को भी तोड़ा जा सकता है. वह अब न केवल अपने गांव, बल्कि पूरे क्षेत्र में शिक्षा की मशाल जलाए हुए हैं. एक वक्त था जब वे पढ़ाई के लिए कोयले से अक्षर बनाती थीं, आज उनके हाथों सैकड़ों बच्चों का भविष्य संवर रहा है. उनकी कहानी संघर्ष और सफलता की मिसाल है, जो हर किसी के लिए प्रेरणा बन सकती है.

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