February 21, 2026
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हाई कोर्ट में झूठी सरकारी रिपोर्ट, कदम-कदम फर्जीवाड़ा, याचिका खारिज

  • May 3, 2025
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Last Updated:May 03, 2025, 20:47 IST Gwalior News : बेशकीमती जमीन से जुड़े मामले में मध्‍य प्रदेश शासन ने जिस व्‍यक्ति के खिलाफ 2011 में केस दायर किया

हाई कोर्ट में झूठी सरकारी रिपोर्ट, कदम-कदम फर्जीवाड़ा, याचिका खारिज

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Gwalior News : बेशकीमती जमीन से जुड़े मामले में मध्‍य प्रदेश शासन ने जिस व्‍यक्ति के खिलाफ 2011 में केस दायर किया था, उस शख्‍स की मौत 1982 में हो चुकी थी. इस बुनियादी तथ्य के गलत होने के बावजूद शासन ने अपील दाय…और पढ़ें

हाई कोर्ट में झूठी सरकारी रिपोर्ट, कदम-कदम फर्जीवाड़ा, याचिका खारिज

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कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है.

हाइलाइट्स

  • हाईकोर्ट ने मृत व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा खारिज किया.
  • शासन ने 1982 में मृत व्यक्ति के खिलाफ 2011 में केस दर्ज किया.
  • अदालत ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए.

ग्वालियर:  हाईकोर्ट ने एक बेशकीमती जमीन से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया है. अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस पूरे प्रकरण में कदम-कदम पर फर्जीवाड़ा किया गया, जिसमें न केवल गलत तरीके से नोटिस तामील कराई गई, बल्कि सरकार की ओर से पेश की गई रिपोर्ट भी झूठी निकली. इस खुलासे ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. दरअसल, यह मामला मरी माता मंदिर फूलबाग रेलवे क्रॉसिंग के पास स्थित एक बेशकीमती जमीन से जुड़ा हुआ है. इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर मध्य प्रदेश शासन ने शिव सिंह टेमक नामक व्यक्ति के खिलाफ जिला कोर्ट ग्वालियर में वर्ष 2011 में केस दायर किया था. चौंकाने वाली बात यह है कि शिव सिंह टेमक की मृत्यु 18 दिसंबर 1982 को ही हो चुकी थी. यानी, शासन ने एक मृत व्यक्ति के खिलाफ उसकी मौत के 29 साल बाद मुकदमा दर्ज कराया था.

जिला कोर्ट ग्वालियर ने वर्ष 2019 में इस मामले में शासन के खिलाफ फैसला सुनाया था. इसके बाद मध्य प्रदेश शासन ने वर्ष 2020 में हाईकोर्ट में फर्स्ट अपील दायर की. हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जब न्यायमूर्ति ने मामले से जुड़े दस्तावेजों की गहन पड़ताल शुरू की, तो परत दर परत फर्जीवाड़े की पोल खुलने लगी. अदालत ने पाया कि मध्य प्रदेश शासन ने जिस व्यक्ति (शिव सिंह टेमक) के खिलाफ अपील दायर की है, उसकी मृत्यु तो 1982 में ही हो चुकी है. इस बुनियादी तथ्य के गलत होने के बावजूद शासन ने अपील दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया.

मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि शासन द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, अक्टूबर 2011 में यह दावा पेश हुआ था और नवंबर 2011 में मृतक शिव सिंह को नोटिस की तामील भी करा दी गई थी. तामील कराने वाले कर्मचारी ने पंचनामे में यह तक लिख दिया कि शिव सिंह की पत्नी अंजू घर पर मिली थीं और उनके पति (शिव सिंह) भी साथ में रहते हैं, लेकिन उस समय घर पर नहीं थे. जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत थी. रिकॉर्ड के अनुसार, शिव सिंह की पत्नी का नाम अंजू नहीं, बल्कि उमा था, जिनकी मृत्यु भी 16 मई 1992 को ही हो चुकी थी. इसके अलावा, स्वयं शिव सिंह की मृत्यु 1982 में हो गई थी और उनका मृत्यु प्रमाण पत्र 12 मई 2016 को जारी किया गया था. ऐसे में, जिस कर्मचारी ने नोटिस की तामील की रिपोर्ट तैयार की, उसने स्पष्ट रूप से झूठी जानकारी दी थी.

हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को ‘कदम-कदम पर फर्जीवाड़ा’ करार दिया है. अदालत ने न केवल मध्य प्रदेश शासन की अपील को खारिज किया, बल्कि इस तरह की लापरवाही और झूठी रिपोर्ट पेश करने पर भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की है. यह घटना सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही की ओर इशारा करती है, जहां एक मृत व्यक्ति के खिलाफ न केवल मुकदमा दर्ज किया जाता है, बल्कि उसे नोटिस भी तामील करा दी जाती है और झूठी रिपोर्ट पेश की जाती है.

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