ऐसे नहीं पनपते आतंकी, बचपन से ही भरा जाता जहर, किताबों में नफरत का पाठ
- May 3, 2025
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Pakistan Terrorism: पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर यह कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि पाकिस्तान आतंकवाद का वैश्विक केंद्र है. लेकिन इससे भी
Pakistan Terrorism: पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर यह कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि पाकिस्तान आतंकवाद का वैश्विक केंद्र है. लेकिन इससे भी
Pakistan Terrorism: पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर यह कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि पाकिस्तान आतंकवाद का वैश्विक केंद्र है. लेकिन इससे भी चिंताजनक एक और सच्चाई है जो सरहद या आतंकी कैंपों से शुरू नहीं होती, बल्कि स्कूलों की कक्षाओं में जन्म लेती है. दशकों से पाकिस्तान के स्कूली पाठ्यक्रम एक शांत हथियार की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं. इसका मकसद सिर्फ शिक्षा देना नहीं बल्कि बच्चों के दिमाग में कट्टरता का बीज बोना है. इन किताबों के पन्नों में इतिहास को याद नहीं किया जाता बल्कि उसे हथियार बनाया जाता है. तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है और दुश्मन का नाम तय कर दिया जाता है. दुश्मनों में सबसे ऊपर भारत का नाम है.
इतिहास का यह जानबूझकर किया गया बदलाव एक खास विचारधारा को मजबूत करने का काम करता है. यही कारण है कि पाकिस्तान में आतंकी आसानी से पनप जाते हैं. क्योंकि उन्हें बचपन से ही नफरत और झूठ की घुट्टी पिलाई जाती है. पाकिस्तानी किताबों में जहर का सबसे उदाहरण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और 1947 के विभाजन की ओर ले जाने वाली घटनाओं का चित्रण है.
स्वतंत्रता आंदोलन को दिया अलग रंग
इन किताबों में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मुश्किल से ही भारतीय बताया जाता है. इसे एक सामूहिक उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के रूप में दिखाने के बजाय, कहानी को इस तरह मोड़ा जाता है कि मुसलमानों को एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी के रूप में चित्रित किया जाता है. जबकि कांग्रेस को खलनायक के रूप में दिखाया जाता है.
क्लास IX-X के लिए पाकिस्तान अध्ययन (पंजाब पाठ्यपुस्तक बोर्ड, 2003 संस्करण) का एक अंश कहता है, “उपमहाद्वीप के मुसलमान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ उठने वाले पहले लोग थे, जबकि हिंदुओं ने ब्रिटिश शासन का स्वागत किया. हिंदू-प्रधान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कभी भी ईमानदारी से मुस्लिम का समर्थन नहीं किया.” यह चित्रण भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और यहां तक कि उदारवादी कांग्रेस नेताओं जैसे भारतीय स्वतंत्रता नायकों की भूमिकाओं को पूरी तरह से नजरअंदाज करता है. साथ ही उनकी जगह एक सांप्रदायिक कहानी गढ़ता है जो विभाजन को शुरुआत से ही अपरिहार्य बना देती है.
विभाजन को बताया ‘दिव्य विजय’
पाकिस्तानी किताबों में प्रस्तुत आम कहानी पाकिस्तान की मांग का एकमात्र कारण हिंदू बहुसंख्यकों द्वारा मुसलमानों के कथित उत्पीड़न और हाशिए पर धकेलना बताती है. इस्लामाबाद के संघीय पाठ्यपुस्तक बोर्ड द्वारा जारी क्लास ग्यारह और बारह के लिए पाकिस्तान अध्ययन की पुस्तक हिंदू चरमपंथ को विभाजन का कारण बताती है. इसमें कहा गया है, “मुसलमान लगभग एक हजार वर्षों तक हिंदुओं के साथ पड़ोसी और हमवतन के रूप में रहे थे. अपने अनुभव के आधार पर वे चरमपंथी हिंदुओं से अच्छे पड़ोसी व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते थे. उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि मुसलमानों का भारत में कोई स्थान नहीं है. उन्हें या तो हिंदू धर्म अपनाना चाहिए या भारत छोड़ देना चाहिए.”
साझा इतिहास के एक त्रासदीपूर्ण या दर्दनाक अध्याय के रूप में विभाजन को चित्रित करने के बजाय पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकें इसे एक आवश्यक और यहां तक कि ‘दिव्य विजय’ के रूप में प्रस्तुत करती हैं. पंजाब बोर्ड की कक्षा 8 की सामाजिक अध्ययन की एक किताब में लिखा है, “पाकिस्तान का निर्माण उपमहाद्वीप के मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद था. इसने उन्हें हिंदू गुलामी से बचाया और उनके धर्म और संस्कृति को संरक्षित किया.”
जिन्ना और गांधी – एक चिंताजनक चित्रण
पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकों का एक सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि वे कैसे मुहम्मद अली जिन्ना का महिमामंडन करते हैं जबकि महात्मा गांधी की एक खराब तस्वीर पेश करते हैं. संघीय पाठ्यपुस्तक बोर्ड द्वारा प्रकाशित कक्षा 10 की एक किताब में लिखा है, “कायद-ए-आजम (जिन्ना) उन मुसलमानों के अधिकारों के लिए खड़े थे जिनका हिंदू नेताओं द्वारा व्यवस्थित रूप से उत्पीड़न किया जा रहा था. गांधी की तथाकथित अहिंसा मुसलमानों को हिंदू प्रभुत्व में फंसाने का एक उपकरण था.”
पाकिस्तानी किताबों में जिन्ना को अक्सर उपमहाद्वीप के मुसलमानों के एकमात्र दूरदर्शी और उद्धारकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. किताबें विभाजन के विचार का विरोध करने वाले विभिन्न मुस्लिम समूहों और नेताओं द्वारा उठाए गए चिंताओं और आलोचनाओं को पर्याप्त रूप से संबोधित करने में विफल रहती हैं.
धर्म और हिंदू ‘अन्य’
पाकिस्तानी स्कूली बच्चों को हिंदू धर्म से एक विश्वास के रूप में नहीं बल्कि एक राजनीतिक और सांस्कृतिक खतरे के रूप में परिचित कराया जाता है. जबकि इस्लाम को स्वाभाविक रूप से बहुसंख्यक धर्म के रूप में प्रमुखता दी जाती है. कई बार हिंदू मान्यताओं और प्रथाओं को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है या रूढ़िवादिता से दिखाया जाता है. इससे धार्मिक ‘अन्य’ होने की भावना पैदा होती है और युवा छात्रों के बीच पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है.
खैबर पख्तूनख्वा पाठ्यपुस्तक बोर्ड की कक्षा IX की इस्लामियात की एक पुस्तक में लिखा है, “हिंदू कई देवताओं की पूजा करते हैं और गायों को पवित्र मानते हैं. उनका धर्म मिथकों पर आधारित है और जाति व्यवस्था के माध्यम से असमानता को बढ़ावा देता है.” पंजाब पाठ्यपुस्तक बोर्ड की कक्षा 9 की पाकिस्तान अध्ययन की पाठ्यपुस्तक कहती है, “हिंदू धर्म ने लगातार इस्लाम को अपने में समाहित करने की कोशिश की जैसा कि उसने अन्य (विश्वास) प्रणालियों के साथ किया था.”
भाषा एक हथियार के रूप में: उर्दू बनाम हिंदी
यहां तक कि भाषा विज्ञान का भी राजनीतिकरण किया गया है. उर्दू को एकमात्र “मुस्लिम” भाषा के रूप में चित्रित किया गया है, जबकि हिंदी को इस्लामी विरासत को मिटाने के लिए हिंदू अभिजात वर्ग द्वारा थोपी गई एक कृत्रिम रचना के रूप में वर्णित किया गया है. बलूचिस्तान पाठ्यपुस्तकों की कक्षा 8 की सामाजिक अध्ययन की किताब के एक अध्याय में लिखा है कि सत्ता में आने पर कांग्रेसी मंत्रालयों ने उर्दू भाषा के खिलाफ एक मजबूत अभियान शुरू किया और हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में लागू किया.
USCIRF ने भी माना किताबों से फैलाया जा रहा जहर
अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) की 2016 की रिपोर्ट जिसका शीर्षक ‘टीचिंग इंटोलरेंस इन पाकिस्तान’ है, पाकिस्तानी सार्वजनिक स्कूली पाठ्यपुस्तकों में व्यवस्थित धार्मिक पूर्वाग्रह और राज्य-अनुमोदित असहिष्णुता को उजागर करती है. पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा (KPK), और बलूचिस्तान – सभी चार प्रांतों की 78 पुस्तकों की समीक्षा के आधार पर अध्ययन पिछली संस्करणों से अवशिष्ट सामग्री के अलावा धार्मिक असहिष्णुता के 70 नए उदाहरणों का खुलासा करता है. लाखों छात्रों द्वारा उपयोग की जाने वाली ये पुस्तकें पाकिस्तान के लिए एक अखंड इस्लामी पहचान पेश करती हैं. जबकि धार्मिक अल्पसंख्यकों – विशेष रूप से हिंदुओं, ईसाइयों, यहूदियों, सिखों और अहमदिया को खतरे, गद्दार या हीन के रूप में चित्रित करती हैं. रिपोर्ट दिखाती है कि कैसे पाठ्यपुस्तकें नकारात्मक रूढ़िवादिता, ऐतिहासिक विकृतियों और सांप्रदायिक घृणा का प्रचार करती हैं, संभावित रूप से भावी पीढ़ियों को कट्टरपंथी बना सकती हैं.
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं: कई पाठ्यपुस्तकें हिंदुओं को “भारतीय एजेंटों” और ईसाइयों को “पश्चिमी सहयोगियों” के रूप में चित्रित करती हैं, उन्हें अविश्वसनीय और पाकिस्तान विरोधी बताती हैं.
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