भोपाल. कश्मीर हुआ लाल… 22 अप्रैल को कश्मीर की खूबसूरत वादियों को नजर लग गई और आतंकवादियों ने वादियों को लाल कर दिया. पहलगाम के बैसरन घाटी में पर्यटकों के साथ हुए नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया है. इस घटना से पूरा देश स्तब्ध है. साहित्य समाज भी आंतकियों की इस कार्रवाई से बेहद क्षुब्ध है. भोपाल की जानी-मानी साहित्यकार ममता तिवारी ने इस दर्द को अपने शब्दों में बयां किया है. पढ़िए उनकी पूरी कविता…
गुलों पे लहू बिखर गया
सारा मंजर ठहर गया
वो जो साथ था बाहों में
एक आवाज़ से जाने किधर गया
खामोश वादियों में ये किसने दस्तक दी
मुल्क मेरा एक बार फिर सहर गया
22 अप्रैल, 2025
क्या दिन था वो “नि: शब्द”
वो बेहद खूबसूरत मंजर था
जहाँ इक प्यार जन्म ले रहा था
चूड़ियों से भरी कलाईयाँ खनखना रही थीं
बच्चे शोर से आसमां सिर पर उठाये थे
धरती पर घोड़े रफ़्तार आज़मा रहे थे
कोई पुराने दिनों की खातिर
कोई नई ज़िन्दगी का आगाज़ करने
जन्नत में उतरा था
यकाएक माहौल धुंआ धुंआ हो गया
जाने कितनों का सपना खो गया
बेमुख्वतों को लाल रंग प्यारा था
हम सुकून का रंग सफेद चाह रहे थे
विचार हमारे आपस में टकरा रहे थे
वो इंसान होना भूल गये
खुद को समझने लगे खुदा
कुदरत भूल खुद न्याय कर रहे थे
कश्मीर के फूल रंग बदल रहे थे
आनंद जब कराह में बदलता है
दिल हमारा फूट फूट कर रोता है
मासूम बच्चों ने जीवन की सुरक्षा खो दी
गोलियों ने खून से मेंहदी धो दी
यहाँ बैठी मैं सोचती हूँ
जिन्हें गोली की आवाज़ पसंद है
वो मेरे अल्फ़ाज़ क्यों सुनेंगे
जिन्होंने सहा ये ज़ुल्म, वो बहरे हो गये
शर्मिंदा हैं उनके लिये जो
इस हादसे से गुज़र गये
लफ़्ज़ बोलने, लिखने से अब
इंकार करते हैं पर याद रखा कश्मीर
हम तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।
22 अप्रेल, 2025 की वो “गुम तारीख़”
तारीख़े कितनी अहम हो जाती हैं
जब हम हादसों से गुज़रते हैं
ऐ कश्मीर कुछ ऐसी ही तारीख़े तुम्हें मुसलमल मिली
पर वो तारीख़े तुम जमा नहीं कर पाये
जब चलते थे शिकारे झील में
सुकून, उल्लास, त्यौहार होते थे
चप्पू की आवाज़ें,
खूशबूदार फूल, बगीचे हुआ करते थे
अचानक सब कुछ लाल हुआ
बेरहमी ने नाज़ुक गुलों को छुआ
खूस से रंगे फूलों से
अब महक नहीं आती
याद वो जुर्म की भुलाये नहीं जाती
कान बंद करने की कोशिश में
वो घाटी से आती चीखें दबाई नहीं जातीं
ममता तिवारी कहती हैं कि वो भी जल्दी एक बार फिर कश्मीर की वादियों में घूमने के लिए जाएंगी. आतंकवादियों के मंसूबे कामयाब नहीं होंगे कि कश्मीर का पर्यटन खत्म हो और वादी में लोगों के पास काम ना बचे.
लहू रंग लायेगा
इतनी खूबसूरती, इतना कुदरती वैभव
किसी ने पाया ना होगा
किसी औऱ पे कुदरत ने ये खज़ाना
लुटाया ना होगा
कश्मीर हुआ लाल
गुलों से नहीं लहू से
पर हौसला रख
जन्नत में बिखरा ये खून ज़ाया ना होगा
औऱ ममता तिवारी की भावनाओं का गुबार खत्म होता है जल्दी आने वाली नई सुबह की उम्मीद के साथ वो लिखती हैं.
चलो इक पौधा लगाएं उनकी याद में
कि हमें अब गुलों की ज़रूरत है
डरो हुओं को हौसला बंधाये
कि कश्मीर बदस्तूर खूबसूरत है
कलम खामोश हुई, शब्द चूक गये
हादसे के बाद, हमारे सिर झुक गये
चलो उठो हिम्मत करो उठो
कोई ये नाम समझे कि
हम झुक गये…