Moonga Silk Farming: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में अब मूंगा रेशम की खेती को लेकर एक नई शुरुआत हो रही है. पर्यावरणविद किशन मलड़ा की मेहनत और पहल के बाद यह जिला अब मूंगा रेशम के उत्पादन में अपनी पहचान बना रहा है. किशन मलड़ा ने यह साबित कर दिया है कि असम के बाद उत्तराखंड भी मूंगा रेशम का प्रमुख केंद्र बन सकता है. लोकल 18 से बातचीत में उन्होंने बताया कि पहाड़ों के युवा अगर मूंगा रेशम की खेती करें, तो वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं और इसके जरिए एक अच्छा मुनाफा भी कमा सकते हैं.
सबसे महंगा रेशम है मूंगा
मूंगा रेशम से बने उत्पादों की बाजार में बहुत मांग है. खासकर मूंगा रेशम की साड़ियां, जिनकी कीमत तीन से छह लाख रुपये तक होती है, यह खेती को लाभकारी बनाती हैं. इस खेती को शुरू करने के लिए सबसे पहले किसानों को रेशम विभाग से संपर्क करके रेशम के कीट लेने होंगे. लेकिन इस प्रक्रिया को शुरू करने से पहले कुछ जरूरी तैयारी करनी होती है. सबसे पहले, शहतूत या बांज के पेड़ों को तीन साल तक पालना पड़ता है, ताकि वे बड़े हो सकें और उस पर कीट आसानी से पाले जा सकें. जब पेड़ बड़े हो जाते हैं, तो उन पर रेशम के कीट छोड़े जाते हैं. ये कीट करीब 60 दिनों में कोकून (रेशम के गोले) बना देते हैं, जिन्हें बाजार में बेचा जा सकता है.
हाई क्वालिटी होता है मूंगा रेशम
मूंगा रेशम की गुणवत्ता बहुत उच्च होती है, इस वजह से यह अन्य रेशम से कहीं ज्यादा महंगा होता है. उत्तराखंड के जलवायु और पहाड़ी क्षेत्रों के वातावरण को देखते हुए, मूंगा रेशम की खेती यहां के लिए उपयुक्त मानी जा रही है. किशन मलड़ा का कहना है कि अगर सरकार और रेशम विभाग मिलकर युवाओं को इस खेती में प्रशिक्षण दें और उन्हें शुरुआती मदद प्रदान करें, तो यह उत्तराखंड की आर्थिक मजबूती का एक अहम हिस्सा बन सकती है. इसके साथ ही, यह युवाओं को गांव में रहते हुए आत्मनिर्भर बनने और अच्छा रोजगार हासिल करने का अवसर भी देगा.
आने वाले समय में उत्तराखंड मूंगा रेशम उत्पादन में देश का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.