February 20, 2026
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धूप-गर्मी नहीं रोक पाई जज़्बा! लौकी की खेती से इस किसान की बदली किस्मत

  • April 22, 2025
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Last Updated:April 22, 2025, 19:04 IST फरीदाबाद के साहुपुरा गांव के किसान बाबू 12 सालों से घीया (लौकी) की खेती कर अपने परिवार का गुजारा कर रहे हैं.

धूप-गर्मी नहीं रोक पाई जज़्बा! लौकी की खेती से इस किसान की बदली किस्मत

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फरीदाबाद के साहुपुरा गांव के किसान बाबू 12 सालों से घीया (लौकी) की खेती कर अपने परिवार का गुजारा कर रहे हैं. उन्होंने 6 बीघा जमीन में फसल लगाई है. सिंचाई, दवाइयों और मेहनत के बाद उनकी फसल अच्छी होती है और बाजार…और पढ़ें

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साहुपुरा

साहुपुरा में घीया की खेती से चमकी किस्म.

हाइलाइट्स

  • फरीदाबाद के किसान 12 सालों से घीया की खेती कर अपने परिवार का गुजारा कर रहे हैं.
  • उन्होंने 6 बीघा जमीन में फसल लगाई है.
  • सिंचाई, दवाइयों और मेहनत के बाद उनकी फसल अच्छी होती है.

फरीदाबाद: फरीदाबाद के बल्लभगढ़ क्षेत्र के साहुपुरा गांव में गर्मी की तपती दोपहर में भी किसान बाबू खेतों में जमकर पसीना बहा रहे हैं. उनका जीवन खेती पर पूरी तरह निर्भर है, और वे पिछले 10 से 12 वर्षों से लगातार लौकी (घीया) की खेती कर रहे हैं. बाबू बताते हैं कि उन्होंने इस बार 6 बीघा जमीन में घीया की फसल बोई है. इसके लिए सबसे पहले खेत की 5 से 6 बार जुताई की जाती है ताकि मिट्टी नरम हो और बीज अच्छी तरह पनप सकें.

6 बीघा खेत में करीब आधा किलो बीज लगता है, जिस पर 5 से 6 हजार रुपये तक की लागत आती है. खेती के बाद हर 10 दिन में एक बार सिंचाई करनी पड़ती है और कीड़ों से बचाने के लिए दवाइयों का छिड़काव जरूरी होता है. बाबू ने खेत पट्टे पर लिया हुआ है और बताते हैं कि जमीन का किराया उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है. किसी-किसी जमीन का किराया 30 हजार रुपये प्रति किला है तो कहीं-कहीं 50 हजार रुपये तक भी होता है.

15 से 20 रुपए किलो बिक रहा है घीया
इस समय बाजार में घीया का भाव 15 से 20 रुपये प्रति किलो है, जिससे उनकी लागत आराम से निकल जाती है और मेहनत का अच्छा फल भी मिलता है. बाबू का कहना है कि साहुपुरा की जमीन और पानी की गुणवत्ता घीया की खेती के लिए बेहद अनुकूल है. यहां का पानी मीठा है, जिससे फसल की पैदावार अच्छी होती है. हालांकि खारे पानी में भी खेती संभव है, लेकिन उसमें फल कम आता है.

आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं किसान
बाबू जैसे किसानों की मेहनत ही है जो हमारे खाने की थाली तक ताजे सब्जियां पहुंचती हैं. वे चाहते हैं कि सरकार छोटे किसानों की मदद के लिए योजनाएं बनाए ताकि वे भी आत्मनिर्भर बन सकें.

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