Bhagwan Parshuram : भगवान विष्णु के छठे अवतार ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका की पुत्र भगवान परशुराम का जन्मोत्सव हर वर्ष अक्षय तृतीया को मनाया जाता है. भगवान परशुराम को अमरता का वरदान प्राप्त है. रामायण काल से महाभारत काल तक भगवान परशुराम का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. रामायण काल में सीता स्वयंवर के दौरान राम परशुराम संवाद हो या महाभारत काल में भीष्म पितामह द्रोणाचार्य और कर्ण जैसी महान योद्धाओं के गुरु परशुराम हो. फरसा चलाने में माहिर और उग्र स्वभाव के भगवान परशुराम इतने क्रोधी थे कि उनके क्रोध की वजह से देवी देवता भी उनसे डरते थे. भगवान परशुराम के बारे में एक कथा प्रचलित है कि उन्होंने अपने हाथों से अपनी मां को मार दिया था. आइये विस्तार से इस घटनाक्रम के बारे में जानते हैं.
यूपी के शाहजहांपुर और जौनपुर से सम्बन्ध : पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद नामक स्थान पर हुआ. लेकिन भगवान परशुराम के पिता यमदग्नि ऋषि और माता रेणुका के अलावा भगवान परशुराम की कर्मभूमि उत्तर प्रदेश का जौनपुर रहा. जहां आज भी यमदग्नि ऋषि का आश्रम मौजूद है.
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परशुराम ने किया अपनी मां का बध : एक दिन भगवान परशुराम के जीवन में एक बहुत ही दुखद और नाटकीय मोड़ आया. उन्होंने अपनी मां का वध कर दिया. पुराने के अनुसार ऋषि जनताग्निक जो भगवान परशुराम के पिता थे उन्होंने अपने पुत्रों को यह आदेश दिया कि वह अपनी माता रेणुका का वध कर दें. तीन पुत्रों के मना करने के बाद भगवान परशुराम ने बिना किसी प्रश्न के अपने पिता का आदेश मानते हुए अपनी माता का वध कर दिया. माता रेणुका सरोवर में स्नान करते वक्त राजा चित्ररथ से प्रभावित होकर उनके साथ नाव विहार करने लगी. अपनी दिव्य दृष्टि से यह देख ऋषि जमदग्नि ने अपने पुत्रों को अपनी पत्नी रेणुका की वध करने का आदेश दिया. पिता की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान परशुराम ने माता रेणुका का सिर काट दिया.
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वरदान से माता को किया पुनः जीवित : महर्षि जमदग्नि भगवान परशुराम के आज्ञा पालन करने से प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान परशुराम को वरदान मांगने को कहा. अपने पिता महर्षि यमदग्नि से मिले वरदान स्वरुप उन्होंने अपनी माता रेणुका को फिर से जीवित किया था. महर्षि जमदग्नि के वरदान से ही भगवान परशुराम को अपराजय और दीर्घायु होने का वरदान प्राप्त था.