6 जमींदार जिनके पास है मुंबई की 20% से अधिक जमीन, सब के सब पारसी, कैसे हुआ ये
- April 12, 2025
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मुंबई एक ऐसा शहर है जहां जमीन की कमी है. इसीलिए यह देश में सबसे महंगा शहर भी है. लेकिन क्या आप इस तथ्य से वाकिफ हैं कि
मुंबई एक ऐसा शहर है जहां जमीन की कमी है. इसीलिए यह देश में सबसे महंगा शहर भी है. लेकिन क्या आप इस तथ्य से वाकिफ हैं कि
मुंबई एक ऐसा शहर है जहां जमीन की कमी है. इसीलिए यह देश में सबसे महंगा शहर भी है. लेकिन क्या आप इस तथ्य से वाकिफ हैं कि शहर के सबसे बड़े जमीन मालिक कौन हैं? स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी (एसआरए) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में कहा गया था कि आर्थिक राजधानी में कुछ ऐसे जमीन मालिक हैं, जिनके पास कुल जमीन का लगभग 20 फीसदी हिस्सा है. महाराष्ट्र में झुग्गी पुनर्विकास परियोजनाओं को रेगुलेट करने के लिए जिम्मेदार एसआरए द्वारा किए गए 2015 के सर्वेक्षण के अनुसार, मुंबई के रियल एस्टेट बाजार में एक लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली जमीन शामिल है, जिसमें से रहने योग्य हिस्सा लगभग 34,000 एकड़ है. इसमें से करीब 20 फीसदी हिस्सा नौ जमीन मालिकों के पास है जिनमें परिवार और ट्रस्ट शामिल हैं. 20 फीसदी में से करीब आधा रहने योग्य हिस्सा मुंबई के विक्रोली इलाके में गोदरेज परिवार के पास है.
संयोग की बात है कि जो ये नौ जमीन मालिक हैं, वे सभी पारसी ट्रस्ट और कंपनियां हैं. पारसियों को अंग्रेजों द्वारा दिए गए भूमि अनुदान और रियल एस्टेट में सही समय पर किए गए निवेश से लाभ हुआ. 18वीं और 19वीं शताब्दी में, ब्रिटिश शासकों ने वफादारी के लिए और लोगों को मुंबई की ओर आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े भूखंड पट्टे पर दिए थे. ये पट्टे पुरस्कार, अनुदान या इनाम के रूप में मिले थे. कई लाभार्थियों को शुरू में पट्टे पर जमीन मिली, लेकिन बाद में उन्हें वही संपत्ति खरीदने की अनुमति दी गई.
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पारसी समुदाय को मिला फायदा
जब अंग्रेजों ने मुंबई पर शासन करना शुरू किया, तो भी यह परंपरा जारी रही. उन्होंने कई गांवों को मराठी हिंदुओं और कोंकणी मुसलमानों सहित विभिन्न धनी लोगों को दिया. लेकिन शहर का सबसे धनी समुदाय पारसी था, जिसने अफीम और कपास के व्यापार में अपना भाग्य बनाया. जाहिर है, उन्हें साल्सेट द्वीप पर जमीन का बड़ा हिस्सा मिला. साल्सेट द्वीप पर ही मुंबई महानगर और ठाणे शहर बसा है. पारसी समुदाय इसका सबसे बड़ा लाभार्थी था. वे मुंबई और उसके आस-पास इलाकों में रियल एस्टेट के सबसे बड़े मालिक बन गए. पारसी जमीन को एक अच्छा निवेश मानते थे. उदाहरण के लिए, कराची स्थित सरकारी ठेकेदार एडुलजी दिनशॉ ने 19वीं शताब्दी के अंत में अपना लगभग सारा पैसा रियल एस्टेट में निवेश कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि कम समय में भी इसका मूल्य बढ़ जाएगा. मुंबई के अतिरिक्त उन्हें कराची का भी प्रमुख जमींदार माना जाता था.
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गोदरेज प्रॉपर्टीज
मुंबई के एसआरए सर्वे के अनुसार, शीर्ष भूमि मालिकों की सूची में गोदरेज परिवार भी शामिल है, जिसके पास विक्रोली इलाके में 3,400 एकड़ से ज्यादा जमीन है. सर्वे के अनुसार, यह जमीन विक्रोली में ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे (ईईएच) पर स्थित है. कंपनी चरणबद्ध तरीके से भूमि बैंक का मोनेटाइजेशन कर रही है. वैसे गोदरेज समूह साबुन और घरेलू उपकरणों से लेकर रियल एस्टेट तक फैला हुआ है. लेकिन उसने जून 2024 में समूह में बंटवारे के लिए एक समझौता किया था. आदि गोदरेज और उनके भाई नादिर गोदरेज ने गोदरेज इंडस्ट्रीज को अपने पास रखा, जिसमें पांच लिस्टेड कंपनियां हैं. जबकि चचेरे भाई जमशेद और स्मिता को अनलिस्टेड गोदरेज एंड बॉयस और उसकी सहयोगी कंपनियां और साथ ही मुंबई में प्रमुख संपत्तियों सहित एक भूमि बैंक मिला.
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अंग्रेजों से खरीदी 3000 एकड़
गोदरेज इंडस्ट्रीज के चेयरमैन आदि गोदरेज के दादा पिरोजशा गोदरेज ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय केवल 30 लाख रुपये में अंग्रेजी हुकूमत से 3000 एकड़ जमीन खरीदी थी. इसके बाद 400 एकड़ जमीनें और खरीदी गईं. मौजूदा वक्त में इनमें से करीब 1000 एकड़ जमीन डेवलप की जा सकने वाली है. इनकी ही अनुमानित कीमत करीब 5 लाख करोड़ रुपये है. गोदरेज प्रॉपर्टीज के पास अब केवल मुंबई नहीं बाकी महानगरों में भी जमीनें हैं. इनमें दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद, बेंगलरु और चेन्नई शामिल हैं. गोदरेज प्रॉपर्टीज इन शहरों में रिहायशी इमारतें और कॉमर्शियल प्रॉपर्टी बनाती है.
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एफई दिनशॉ ट्रस्ट
मुंबई के बड़े जमींदारों में एफई दिनशॉ ट्रस्ट दूसरे स्थान पर है और इसके पास मुंबई में करीब 683 एकड़ जमीन है. सर्वेक्षण के अनुसार, ट्रस्ट के पास मलाड और आसपास के इलाकों में भूमि बैंक है. एफई दिनशॉ एक पारसी सॉलिसिटर-फाइनेंसर और जमींदार थे, जिनकी मृत्यु 1936 में हो गई. दिनशॉ अपने परिवार के लिए भारी-भरकम जमीन छोड़ गए थे. जिसे समय-समय पर सरकार ने अधिग्रहित कर लिया या उसका मोनिटाइजेशन कर दिया.
सुरजी, जीजीभॉय और वाडिया परिवार
मुंबई के तीसरा सबसे बड़ा जमीन मालिक प्रतापसिंह वल्लभदास सुरजी का परिवार है. जिनके पास मुंबई के भांडुप क्षेत्र और उसके आसपास लगभग 647 एकड़ जमीन है. मुंबई में चौथी सबसे ज्यादा जमीन जीजीभॉय आर्देशिर ट्रस्ट के पास है. इसके पास मुंबई के चेंबूर में 508 एकड़ जमीन है. वहीं, एएच वाडिया ट्रस्ट के पास कुर्ला में 361 एकड़ जमीन है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 20वीं सदी की शुरुआत में मुंबई समाचार के कामा परिवार ने ट्रस्ट का प्रबंधन किया था. चेंबूर में लगभग एक तिहाई जमीन का स्वामित्व उनके पास था. 19वीं सदी की शुरुआत में अर्देशिर होर्मुसजी वाडिया ने 3,587 रुपये के वार्षिक किराये पर कुर्ला का पट्टा प्राप्त किया था, जो अब ज्यादातर अतिक्रमण का शिकार हो चुका है.
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बायरामजी जीजीभॉय ग्रुप
एसआरए सर्वेक्षण के अनुसार, सर बायरामजी जीजीभॉय ट्रस्ट के पास मुंबई के विभिन्न हिस्सों में 269 एकड़ जमीन है. 19वीं सदी के पारसी सामाजिक कार्यकर्ता सर बायरामजी जीजीभॉय को 1830 में ईस्ट इंडिया कंपनी से कुल 12,000 एकड़ जमीन के सात गांव मिले थे. रिपोर्टों के अनुसार, उनके पास बांद्रा लैंड्स एंड का भी स्वामित्व था, जहां अब ताज होटल है. इनके अलावा, अन्य निजी जमीन मालिकों जैसे सर मुहम्मद यूसुफ खोत ट्रस्ट, वी.के. लाल परिवार के पास भी मुंबई के कांजुरमार्ग और कांदिवली क्षेत्र में बड़ी मात्रा में जमीन है. सर बायरामजी जीजीभॉय ने शहर में कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की.
सरकार के पास भी विशाल भूमि बैंक
मुंबई में बड़े पैमाने पर भूमि के स्वामित्व वाली कई निजी संस्थाओं के साथ-साथ, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट, राष्ट्रीय वस्त्र निगम, महाराष्ट्र सरकार, केंद्र सरकार, मध्य रेलवे, पश्चिम रेलवे जैसी कई सरकारी एजेंसियों के पास भी शहर में जमीन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
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हालांकि, कई अन्य बड़े पारसी भूस्वामियों के वंशज अपनी विशाल जमीन को बचा पाने में सफल नहीं हो पाए. समुदाय के अंदरूनी लोगों का कहना है, “पिछले 60-65 सालों में उनके बच्चों के लिए जमीन के बड़े हिस्से को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया था. अतिक्रमणकारियों और स्थानीय झुग्गी-झोपड़ियों के नेताओं ने कब्जा कर लिया. वे कुछ नहीं कर सकते थे.” वास्तव में उनमें से कोई भी नहीं जानता था कि एक दिन उनकी जमीन की कीमत बढ़कर इतनी ज्यादा हो जाएगी. आजादी के बाद तक जमीन का कोई खास मूल्य नहीं था. उदाहरण के लिए, 60 साल पहले, बांद्रा में 1,000 वर्ग गज का प्लॉट सिर्फ 5,000 रुपये में मिलता था. आज इसकी कीमत एक लाख रुपये प्रति वर्ग गज है.
