नरेश पारीक/चूरू- राजस्थान का शेखावाटी अंचल किस्से और कीवदंतियों से भरा पड़ा है. यहां लोक देवताओं और नाथ संप्रदाय के साधकों को भगवान की तरह पूजा जाता है. इन्हीं 12 प्रमुख पंथों में से एक है मन्नानाथी पंथ, जिसका मुख्य आश्रम झुंझुनूं जिले के टाई गांव में स्थित है.
राजा से संत बने मन्नानाथ जी ने की थी आश्रम की स्थापना
नाथ संप्रदाय से जुड़े महंत बताते हैं कि टाई गांव का यह ऐतिहासिक आश्रम लगभग 3500 वर्ष पुराना है. इसकी स्थापना राजा रिसालू ने की थी, जो गोरखनाथ जी से प्रभावित होकर अपना राजपाट छोड़कर संन्यास ले तपस्या में लीन हो गए थे. घने जंगल में साधना कर उन्होंने इस स्थान को आस्था का केंद्र बना दिया.
सियालकोट से जुड़ी है मन्नानाथ जी की कहानी
चंचलनाथ टीला के प्रभारी ओमनाथ महाराज के अनुसार, राजा रिसालू का मूल स्थान सियालकोट (जो आज पाकिस्तान में है) था. कभी सियालकोट भारत के पंजाब प्रांत का हिस्सा हुआ करता था. गोरखनाथ जी की भक्ति से प्रभावित होकर रिसालू ने संसारिक जीवन त्याग दिया और टाई के घने जंगलों में तपस्या कर मन्नानाथ आश्रम की स्थापना की.
आश्रम में 500 बीघा भूमि और 34 से अधिक समाधियां
वर्तमान में मन्नानाथ आश्रम के पास करीब 500 बीघा भूमि है. धीरे-धीरे आश्रम का विस्तार हुआ है और यह एक भव्य रूप ले रहा है. आश्रम परिसर में एक धूनी (अखंड अग्नि) जलाई जाती है, जहां सुबह-शाम नियमित पूजा-अर्चना होती है. यहां 34 से अधिक साधकों की समाधियां भी स्थित हैं, जो इस स्थल की ऐतिहासिकता को और भी गहरा करती हैं.
मृत बालक को मिला था नया जीवन
आस्थाओं को और मजबूत करने वाला एक किस्सा भी यहां से जुड़ा है. ओमनाथ महाराज बताते हैं कि वर्षों पहले एक बनिए का छोटा बच्चा मृत्यु को प्राप्त हो गया था. परिजनों ने मृत बालक को आश्रम की गुफा में अर्पित कर दिया. छह महीने बाद जब परिजन लौटे और बच्चे के बारे में पूछा तो तत्कालीन महंत गंभीरनाथ जी ने इशारा करते हुए कहा, “देखो, बच्चा मिश्री खा रहा है.” वह बालक जीवित था और उसे मिश्रीनाथ नाम दिया गया. इस चमत्कार ने इस स्थान की आस्था को और भी गहरा कर दिया.