February 21, 2026
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1971 में भारत ने पाकिस्तान के किन इलाकों पर कब्जा किया? लेकिन फिर लौटा दिया

  • April 25, 2025
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पहलगाम आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की बैठक में पांच महत्वपूर्ण फैसले लिए गए. इस आतंकी

1971 में भारत ने पाकिस्तान के किन इलाकों पर कब्जा किया? लेकिन फिर लौटा दिया

पहलगाम आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की बैठक में पांच महत्वपूर्ण फैसले लिए गए. इस आतंकी घटना के बाद पूरा देश आहत है और पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की जा रही है. पाकिस्तान ने भारत के साथ हुए शिमला समझौते को रद्द कर दिया है. उसने ये कार्रवाई भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के जवाब में की है. शिमला समझौते में भारत ने पाकिस्तान को जो जगहें कब्जे के बाद वापस की थीं, उसमें करतारपुर साहिब भी था. 

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साल 1971 में भारतीय सेनाएं पाकिस्तान में काफी अंदर तक घुस गई थीं. यही नहीं भारतीय सेना ने काफी बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया था. तब भारत इस स्थिति में था कि करतारपुर साहिब या पीओके का कुछ हिस्सा आराम से अपने पास रख सकता था. कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी गुरुवार को कहा कि हमारे पास यह सुनहरा अवसर है कि हम पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) पर हमला करें और उसे भारत में मिला लें. ताकि पाकिस्तान को सबक सिखाया जा सके. हालांकि, यह मेरा निजी मत है. इन तमाम बातों के बीच 54 साल (1971 का युद्ध) पहले हुए उस युद्ध को याद करना जरूरी है, जब भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान की काफी जमीन पर कब्जा कर लिया था. 

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15,010 वर्ग किमी पर किया था कब्जा
1971 के युद्ध में भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान के खिलाफ दो मोर्चों से जबरदस्त हमला बोला. एक मौजूदा पाकिस्तान की ओर और दूसरा पूर्वी पाकिस्तान की ओर, जो अब बांग्लादेश है. भारतीय सेना ने पाकिस्तान में करीब 15,010 वर्ग किलोमीटर (5,795 वर्ग मील) भूमि पर कब्जा कर लिया था. 90,000 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बना लिया गया. उस युद्ध में हम जिस बढ़त की स्थिति में थे, उसमें पाकिस्तान की जमीन लौटाने और इतने सैनिकों को रिहा करने के बदले हम करतारपुर अपने पास रख सकते थे. क्योंकि भारतीय सेना ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की शकरगढ़ तहसील पर कब्जा कर लिया था.

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भारत ने पाकिस्तान को लौटा दी जमीन
1971 के युद्ध में पराजय के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो साल 1972 में समझौता करने शिमला आए थे. समझौते के अनुसार भारत ने पाकिस्तान के सभी युद्धबंदी सैनिकों को रिहा कर दिया. साथ ही वो सारी जमीन भी लौटा दी, जिस पर भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अंदर तक घुसकर कब्जा कर लिया था. जिन इलाकों पर कब्जा किया था, वो ये हैं…

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की शकरगढ़ तहसील
राजस्थान की सीमा से लगे कुछ महत्वपूर्ण इलाके
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के बाल्टिस्तान क्षेत्र में तीन महत्वपूर्ण गांव
13 दिसंबर 1971 को नुब्रा घाटी का तुरतुक गांव
शिमला समझौते के बाद भारत ने सदभावना दिखाते हुए पाकिस्तान की सारी जमीन वापस कर दी.

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क्यों पैदा हुए युद्ध के हालात
1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ था, तब पाकिस्तान को दो इलाके मिले थे. पहला भारत के पश्चिमी और दूसरा पूर्वी सीमा की ओर. हालांकि पाकिस्तान की बनावट काफी विचित्र थी. एक ऐसा देश जो इस तरह एक अन्य देश के दोनों ओर बसा हो. पूर्वी पाकिस्तान की संस्कृति और बोली सब कुछ पश्चिमी पाकिस्तान से अलग था. शेख मुजीब पूर्वी पाकिस्तान में बड़े नेता थे. वह ये चाहते थे कि पूर्वी पाकिस्तान को स्वायत्ता मिले और वो खुद इस हिस्से पर शासन करें. पश्चिमी पाकिस्तान में बैठे हुक्मरान ना तो उनकी स्थितियों को समझते थे और ना ही ध्यान देना चाहते थे. इस इलाके में असंतोष बढ़ रहा था. जब पूर्वी पाकिस्तान के चुनावों में शेख मुजीब जीते तो पाकिस्तानी सेना ने उनको जेल में डाल दिया. सेना बड़े पैमाने पर धरपकड़ करने लगी. नरसंहार शुरू हो गया.

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मानेकशा से तैयार रहने को कहा
इन सब वजहों से पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध तनावपूर्ण हो चले थे. मार्च 1971 से ही ऐसी स्थितियां बनने लगी थीं. भारत धैर्य का परिचय दे रहा था. लेकिन उसे अंदाज होने लगा था कि अगर पाकिस्तान की सेना का दमनचक्र खत्म नहीं हुआ तो कुछ करना होगा. अप्रैल आते आते भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सैन्य प्रमुख जनरल मानेकशा से पूछा कि क्या हमारी सेनाएं पाकिस्तान से युद्ध के लिए तैयार हैं. मानेकशा ने इंदिरा गांधी से दो महीने का समय मांगा. उनका कहना था कि सैन्य आपरेशन के लिए सबसे बेहतर समय नवंबर – दिसंबर का रहेगा.

पहला हमला पाकिस्तान ने किया
युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान के ऑपरेशन ‘चंगेज खान’ से हुई. इसके तहत पाकिस्तान ने आठ भारतीय वायु स्टेशनों पर हवाई हमला कर दिया. इनमें आगरा का एयरफोर्स बेस भी शामिल था. इसके बाद भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया. भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. भारतीय सेनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान के मोर्चे पर बंगाली राष्ट्रवादी ताकतों का साथ दिया ताकि वो पाकिस्तान से अलग होकर खुद को आजाद घोषित कर सकें.

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भारत ने किया बड़े इलाके पर कब्जा
पूर्वी के साथ पश्चिमी मोर्चे पर भी भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं के बीच संघर्ष शुरू हो गया. युद्ध तीन दिसंबर को शुरू हुआ. अगले 13 दिनों में भारत ने स्पष्ट बढ़त बना ली. भारतीय सेना द्वारा लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बनाया गया था. इस युद्ध में भारतीय वायुसेना ने दोनों मोर्चों पर थलसेना का भरपूर साथ दिया. समुद्र में भारतीय नौसेना ने कमान संभाल ली. पाकिस्तानी सेना के पैर उखड़ गए, वो मुकाबला ही नहीं कर पायी. वहीं भारतीय सेना पश्चिमी पाकिस्तान में घुसती जा रही थी. सेना ने करीब 15,010 किमी इलाके पर कब्जा कर लिया. इसमें आजाद कश्मीर, पंजाब और सिंध हमारे पास आ चुके थे. हालत ये हो गई थी कि पाकिस्तान सेना युद्ध करने की स्थिति में ही नहीं रह गई थी.

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आत्म समर्पण किया और नुकसान उठाया
16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने आखिरकार एकतरफा युद्धविराम की अपील जिसे भारत ने मान लिया. पाकिस्तान सेना ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. इस तरह 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध समाप्त हो गया. पाकिस्तान को सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ा. उसके करीब  8,000 लोग मारे गए और 25,000 घायल हुए. जबकि भारत के 3,000 लोग मारे गए और 12,000 घायल हुए. 17 दिसंबर को दोपहर 2.30 बजे युद्ध आधिकारिक तौर पर खत्म हो गया. इस युद्ध के बाद आजाद बांग्लादेश का जन्म हुआ.

क्या पीओके और करतारपुर मिल जाता
शर्मनाक शिकस्त के बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान को इस्तीफा देना पड़ा. उनके स्थान पर जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान की कमान संभाली. जानकार मानते हैं कि इस मौके पर इंदिरा गांधी ने अगर दबाव डाला होता तो भारत पीओके पर कब्जा किया हुआ हिस्सा और करतारपुर साहिब पाकिस्तान से ले सकता था. हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय  अंतरराष्ट्रीय दबाव था कि भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके पहले ही उसे काफी नुकसान पहुंचा दिया है. इस क्षेत्र में एक नए देश (बांग्लादेश) का जन्म हुआ. इसलिए भारत को पश्चिमी पाकिस्तान में उसकी छीनी गई सारी जमीन लौटा देनी चाहिए. अगर वो ऐसा करता है तो इस क्षेत्र में सदभावना बनाए रखने के लिए बेह रहेगा. लिहाजा इंदिरा गांधी ने यही किया. हालांकि यह कदम उठाने से पहले इंदिरा गांधी खुद असमंजस में थीं. लेकिन उन्होंने वही किया जो उस समय के हिसाब से बेहतर था.

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