बारह महीने – बारह परहेज: पुरानी नसीहत, आज भी उतनी ही असरदार
- February 4, 2026
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बारह महीने – बारह परहेज: पुरानी नसीहत, आज भी उतनी ही असरदार भारतीय परंपरा और आयुर्वेद में स्वास्थ्य को लेकर जो ज्ञान सदियों पहले दिया गया था, वह
बारह महीने – बारह परहेज: पुरानी नसीहत, आज भी उतनी ही असरदार भारतीय परंपरा और आयुर्वेद में स्वास्थ्य को लेकर जो ज्ञान सदियों पहले दिया गया था, वह
भारतीय परंपरा और आयुर्वेद में स्वास्थ्य को लेकर जो ज्ञान सदियों पहले दिया गया था, वह आज के आधुनिक समय में भी उतना ही प्रासंगिक साबित हो रहा है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक तस्वीर ने लोगों का ध्यान फिर से “बारह महीने – बारह परहेज” की ओर खींचा है। इस तस्वीर में साल के हर महीने या ऋतु के अनुसार कुछ खास खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सलाह दी गई है, जिसे पुराने जमाने की नसीहत कहा गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह आज भी 100 प्रतिशत फिट बैठती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार, हर मौसम में शरीर की जरूरतें बदलती हैं। यदि खानपान मौसम के अनुसार न हो, तो पाचन तंत्र, इम्यूनिटी और संपूर्ण स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने ऋतु के अनुसार खाने-पीने की एक स्पष्ट व्यवस्था बनाई थी, जिसे ऋतुचर्या कहा जाता है।
चैत्र महीने में शरीर में कफ और पित्त का संतुलन बिगड़ सकता है। ऐसे में गुड़ का सेवन शरीर में गर्मी बढ़ा सकता है, जिससे एलर्जी, फोड़े-फुंसी और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय हल्का और सुपाच्य भोजन सबसे बेहतर माना जाता है।
गर्मी के बढ़ते प्रकोप के साथ बैसाख महीने में अधिक तेलयुक्त भोजन शरीर को सुस्त और थका हुआ बना सकता है। ज्यादा तेल खाने से एसिडिटी, अपच और मोटापे की समस्या बढ़ सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इस समय उबले, भाप में पके और हल्के भोजन को प्राथमिकता दी जाए।
तेज गर्मी और लू के कारण जेठ महीने में लंबी यात्रा करना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। डिहाइड्रेशन, चक्कर और थकान की शिकायत आम हो जाती है। यदि यात्रा आवश्यक हो, तो पानी, फल और हल्का भोजन जरूर साथ रखें।
बरसात की शुरुआत में पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। ऐसे में बेल जैसे भारी फल का सेवन पेट संबंधी समस्याएं बढ़ा सकता है। इस मौसम में हल्के फल और ताजे खाद्य पदार्थ ज्यादा उपयुक्त माने जाते हैं।
सावन के महीने में नमी अधिक होने के कारण हरी सब्जियों में कीड़े और बैक्टीरिया पनपने की संभावना रहती है। आयुर्वेद में इस समय सीमित मात्रा में अच्छी तरह पकी हुई सब्जियां खाने की सलाह दी जाती है।
मानसून के बाद के इस समय दही का सेवन कफ बढ़ा सकता है और सर्दी-जुकाम की समस्या पैदा कर सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दही की जगह छाछ या पतला मट्ठा बेहतर विकल्प हो सकता है।
इस समय मौसम परिवर्तनशील होता है। करेला जैसे अत्यधिक कड़वे पदार्थ पाचन तंत्र पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। संतुलित और साधारण भोजन इस समय सबसे बेहतर रहता है।
ठंड की शुरुआत में मठा या छाछ शरीर को ठंडा कर सकती है, जिससे जोड़ों में दर्द और सर्दी की समस्या हो सकती है। गर्म और पौष्टिक भोजन इस समय अधिक फायदेमंद होता है।
कड़ाके की ठंड में धनिया जैसे ठंडे तासीर वाले पदार्थ शरीर के तापमान को और कम कर सकते हैं। इस समय गरम मसालों और पौष्टिक आहार को प्राथमिकता दी जाती है।
मौसम बदलने के साथ फागुन में चना जैसे भारी खाद्य पदार्थ गैस और अपच की समस्या बढ़ा सकते हैं। इस समय हल्का भोजन शरीर को संतुलित रखने में मदद करता है।
आधुनिक डॉक्टर और न्यूट्रिशन एक्सपर्ट भी मानते हैं कि यदि खानपान मौसम के अनुसार हो, तो बीमारियों से बचा जा सकता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग फास्ट फूड और प्रोसेस्ड फूड पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं, जिससे लाइफस्टाइल डिजीज तेजी से बढ़ रही हैं।
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खानपान का असर सिर्फ शरीर पर ही नहीं, बल्कि दांतों और मुंह की सेहत पर भी पड़ता है। गलत समय पर गलत चीजें खाने से दांतों में सेंसिटिविटी, कैविटी और मसूड़ों की समस्या हो सकती है। दंत स्वास्थ्य से जुड़ी सही जानकारी के लिए लोग www.dentalclinicpro.com जैसे विश्वसनीय प्लेटफॉर्म्स पर भी भरोसा कर रहे हैं।
“बारह महीने – बारह परहेज” केवल एक पुरानी कहावत नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक जीवनशैली है। यदि हम अपने खानपान को मौसम के अनुसार ढाल लें, तो बिना दवा के भी कई बीमारियों से बचा जा सकता है। आधुनिक विज्ञान भी अब उसी बात की पुष्टि कर रहा है, जो हमारे पूर्वज सदियों पहले कह गए थे।
यह नसीहत आज के समय में पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है, जब लोग प्राकृतिक जीवनशैली से दूर होते जा रहे हैं। सही समय पर सही भोजन ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।
