Ranchi News: रांची के आड्रे हाउस में झारखंड वन विभाग द्वारा दो दिवसीय इंडीजीनस फूड फेस्टिवल ‘अनकादिरी’ का आयोजन किया गया. इसमें बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी खानपान को प्रस्तुत किया गया. यहां पर आदिवासी व्यंजनों को पारंपरिक तरीके से सजाया गया था. आपको यहां खास पकौड़ी से लेकर कई तरह की दाल और बीज देखने को मिलेंगे, जो शायद पहले कभी नहीं देखे होंगे.
बिहार के जमुई से आई अंजू बताती हैं, “हमारा यह खान-पान काफी पारंपरिक है और पुराने जमाने का है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे खाने से आप बीमार नहीं पड़ेंगे. हमारे पास रागी के समोसे से लेकर कुछ ऐसी चटनी हैं, जिसे गर्मी के मौसम में खाने से शरीर ठंडा हो जाता है. ये सभी चीजें प्राकृतिक हैं और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से लड़ने में भी सहायक हैं.”
इतने सारे अनाज कभी नहीं देखे
यहां खासतौर पर इंडीजीनस फूड को चखने आए दिलीप बताते हैं, “इतने सारे अनाज तो हमने पहले कभी नहीं देखे. इसमें गोंदली सत्तू, मकई चावल, स्वां चावल, कोदो मिलेट, बट्टी राला, फिंगर मिलेट, बललर, राजगिरा, सिकिया मिलेट, कोदो बिस्कुट, कुल्थी, तेंदु का बीज, जंगली कंदा, लाल चावल की खीर शामिल हैं. ये सभी चीजें हमने जंगल में या फिर बचपन में गांव में देखी थीं. इन सबका अपना औषधीय गुण है और कुछ मिलेट को जीआई टैग भी मिलना चाहिए.”
जंगली और ताकतवर चीजें
वहीं, हर एक आइटम का स्वाद लेते संदीप बताते हैं, “मुझे यहां बहुत मजा आ रहा है. मैंने हर एक चीज का स्वाद चखा है. निश्चित तौर पर कुछ चीजें जैसे जंगली कंदा या गोंदली का सत्तू बहुत ही ताकतवर हैं. इन्हें पीने से ऐसा लगता है जैसे मरे हुए शरीर में जान आ गई हो. सरकार को इन चीजों को जीआई टैग दिलाने के लिए प्रयास करना चाहिए. ये सभी चीजें प्राकृतिक हैं और हमारे पर्यावरण के लिए भी बहुत अच्छी हैं.”
बीमारी रहे कोसों दूर
वहीं, प्रीति बताती हैं, “हम खास तौर पर बिहार से आए हैं और हमारे यहां दो स्टॉल लगे हैं. हमारे पास जो भी आइटम हैं, वे सभी रागी या मिलेट से बने हुए हैं. आपको बिस्कुट भी मल्टीग्रेन का मिलेगा. कोई भी चीज हानिकारक नहीं है. हम चीनी और मैदा का इस्तेमाल नहीं करते. ऐसे में ये बीमारियों को भी दूर रखते हैं. हम आदिवासी इसी का सेवन करते आ रहे हैं. आज तक हमें दवा की जरूरत नहीं पड़ी. लोगों को इसके प्रति रुझान दिखाना चाहिए. इससे उनका स्वास्थ्य भी उत्तम रहेगा.”