रेको दिक में सोना है, पर बारूद भी! चीन ने कीमत चुकाई, अब US-UK को लपेट रहा पाक
- April 13, 2025
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नई दिल्ली: रेको दिक, बलूचिस्तान की धरती में छुपा वो खजाना है जो पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देने का सपना बन चुका है. तांबा और सोने
नई दिल्ली: रेको दिक, बलूचिस्तान की धरती में छुपा वो खजाना है जो पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देने का सपना बन चुका है. तांबा और सोने
नई दिल्ली: रेको दिक, बलूचिस्तान की धरती में छुपा वो खजाना है जो पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देने का सपना बन चुका है. तांबा और सोने का अपार भंडार होने के बावजूद ये जमीन अमन की नहीं, बारूद की महक से भरी है. पाकिस्तान भले ही इस जमीन को विदेशी निवेश का स्वर्ग बता रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि इस पर कब्जे की लड़ाई आज भी जोरों पर है. कभी बम धमाकों में, तो कभी ट्रेन हाईजैक जैसे खुले विद्रोह में. पाकिस्तान की कोशिशें अब अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा को रेको दिक में पैसा लगाने के लिए लुभाने की हैं.
हाल ही में प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और अमेरिकी अधिकारी एरिक मेयर के बीच हुई बैठक में इसी पर चर्चा हुई. इस बैठक से ठीक पहले पाकिस्तान ने एक भव्य ‘मिनरल इन्वेस्टमेंट फोरम’ आयोजित किया था, जहां अमेरिका, कनाडा, चीन, तुर्की, यूके और सऊदी अरब जैसे देशों के प्रतिनिधि पहुंचे. मंच पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर भी थे, जिन्होंने भरोसा दिलाया कि सेना पूरी सुरक्षा देगी. पर सवाल ये है कि क्या सिर्फ मंच से की गई घोषणाएं जमीन पर टिक पाएंगी? चीन के साथ हुआ अनुभव तो कुछ और ही कहता है.
चीन के सबक से सीखेंगे या फिर…
चीन पाकिस्तान का सबसे करीबी दोस्त रहा है. उसने CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के तहत अरबों डॉलर झोंके, सड़कों से लेकर पावर प्लांट तक बनाए, लेकिन बदले में उसे क्या मिला? आत्मघाती हमले, अपहरण और दर्जनों चीनी मजदूरों की जान. BLA जैसे बलूच विद्रोही संगठनों ने चीन के खिलाफ कई बार मोर्चा खोल दिया है. यहां तक कि चीन ने पाकिस्तान को सुझाव दिया कि हमारी सेनाएं खुद आपकी जमीन पर सुरक्षा का जिम्मा संभालें, लेकिन अब तक पाकिस्तान ने यह मांग नहीं मानी. अब अगर अमेरिका या ब्रिटेन जैसे देश यहां निवेश की सोचते हैं, तो क्या वो चीन जैसी कीमत चुकाने को तैयार होंगे?
बलूचों का गुस्सा: ‘हमारी मिट्टी, हमारा हक!’
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा लेकिन सबसे उपेक्षित प्रांत है. यहां के लोगों को अब तक साफ पानी, अस्पताल, रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं भी ठीक से नहीं मिलीं. इसके उलट, उन्हें अपनी जमीन पर बाहरी लोगों का कब्जा सहना पड़ा है. स्थानीय लोग मानते हैं कि केंद्र सरकार रेको दिक जैसे प्रोजेक्ट्स से अरबों कमाएगी, लेकिन यहां के युवाओं को सिर्फ बेरोजगारी और बमों की आवाज मिलेगी.
यही कारण है कि BLA जैसे संगठन पैदा हुए और बढ़ते जा रहे हैं. वे इन खनन प्रोजेक्ट्स को ‘नए दौर की गुलामी’ बताते हैं. हाल ही में BLA ने 400 लोगों से भरी एक ट्रेन को हाईजैक कर लिया था. इसमें दर्जनों की मौत हुई, ये हमला एक चेतावनी थी कि बलूच अब चुप नहीं बैठेंगे.
सेना की ‘गारंटी’ और जमीनी सच्चाई
पाकिस्तानी सेना के प्रमुख चाहे जितने वादे कर लें, जमीनी सच्चाई ये है कि बलूचिस्तान में सेना खुद लगातार निशाने पर है. सितंबर 2024 में BLA के हमलों में 70 से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें से बड़ी संख्या पंजाबी मजदूरों की थी. यह हमला इसलिए भी किया गया क्योंकि स्थानीय लोगों को लगता है कि बाहरी लोग उनकी जमीन पर रोजगार और पैसा ले जाते हैं, जबकि वे खुद हाशिए पर खड़े रह जाते हैं.
‘डॉलर के सपने’ बनाम ‘बारूद की हकीकत’
पाकिस्तान सरकार बार-बार यह कह रही है कि रेको दिक और दूसरे मिनरल प्रोजेक्ट्स से अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी. प्रधानमंत्री से लेकर आर्मी चीफ तक सभी इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हिस्सा बताने लगे हैं. लेकिन जिनकी जमीन से ये सब निकलेगा, उन बलूचों को कोई भरोसा नहीं हो रहा. क्योंकि पिछले कई दशकों से उन्हें सिर्फ वादे मिले हैं, विकास नहीं.
अगर कोई देश ये सोच रहा है कि वो पाकिस्तान के शब्दों पर भरोसा करके बलूचिस्तान में निवेश करेगा, तो उसे पहले वहां के जलते हालात और गुस्से से भरी फिजा को समझना होगा. रेको दिक में सोना जरूर है, लेकिन वो सोना हथियारों से घिरा है, खून से सना है और उन लोगों के हक का हिस्सा है जिन्हें अब भी अपनी ही जमीन पर पराया समझा जाता है.
