राहुल जिसे बना रहे थे हथियार, कांग्रेस ने भी पाल रखे थे सपने हजार, वही गायब
- April 22, 2025
- 0
कर्नाटक की सियासत इन दिनों एक ऐसे कागज को लेकर उबाल पर है, जिसे राहुल गांधी सामाजिक न्याय की लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार बता रहे थे. इसी
कर्नाटक की सियासत इन दिनों एक ऐसे कागज को लेकर उबाल पर है, जिसे राहुल गांधी सामाजिक न्याय की लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार बता रहे थे. इसी
कर्नाटक की सियासत इन दिनों एक ऐसे कागज को लेकर उबाल पर है, जिसे राहुल गांधी सामाजिक न्याय की लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार बता रहे थे. इसी कागज के दमपर कांग्रेस दिल्ली की गद्दी पर बैठने के सपने तक देख रही थी. वह अपनी कागज रहस्यमयी तरीके से गायब हो गई है. यह कागज कुछ और नहीं, बल्कि कांथराज आयोग की मूल सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वे रिपोर्ट…
कांथराज आयोग की तरफ से तैयार की गई जातिगत सर्वे की इस रिपोर्ट को कांग्रेस लंबे समय से ‘बहुसंख्यक पिछड़ों के हक़’ की आधारशिला बताती रही है. राहुल गांधी ने भी बार-बार सार्वजनिक मंचों से इस रिपोर्ट का जिक्र करते हुए जातीय जनगणना की मांग तेज की थी. लेकिन अब वही रिपोर्ट न सिर्फ गायब है, बल्कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार भी इस गुमशुदगी पर खामोश है. इस मामले पर विपक्षी बीजेपी और जेडीएस ने कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोल दिया है.
नया आंकड़ा, नई बहस
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस सरकार ने के. जयप्रकाश हेगड़े की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया था. उसने 2023 में जो रिपोर्ट सौंपी है, वह पूरी तरह से सैंपल डेटा पर आधारित है. हेगड़े ने साफ कहा, ‘यह सही है कि कांथराज आयोग की तरफ से संकलित मूल डेटा उपलब्ध नहीं है. हमारे पास विकल्प नहीं था, इसलिए सैंपल-आधारित रिपोर्ट तैयार करनी पड़ी.’
इस स्वीकारोक्ति के बाद राजनीति गरमा गई. बीजेपी नेता आर अशोक ने कहा, ‘जिस दस्तावेज़ की नींव ही नहीं है, उस पर कोई नीतिगत फैसला कैसे लिया जा सकता है? यह कर्नाटक की जनता के साथ अन्याय है.’
जेडीएस ने भी इसे वोट बैंक की राजनीति करार देते हुए कहा, ‘जब तक सरकार यह स्पष्ट नहीं करती कि मूल रिपोर्ट कहां है, तब तक संशोधित रिपोर्ट को स्वीकार करना जनता के साथ धोखा होगा.’
गायब रिपोर्ट और लापरवाही का सबूत
सोशल मीडिया पर वायरल एक पत्र ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है. बताया जा रहा है कि यह पत्र नवंबर 2023 में आयोग के अध्यक्ष हेगड़े ने सरकार को लिखा था, जिसमें कहा गया है कि अगस्त 2021 में मूल रिपोर्ट के बंद बॉक्स खोले गए थे. रिपोर्ट की छपी प्रतियां तो मौजूद थीं, लेकिन उन पर सदस्य सचिव के हस्ताक्षर नहीं थे, और मूल ब्लूप्रिंट नदारद था.
पत्र में लिखा गया है, ‘संबंधित अधिकारी को मूल ब्लूप्रिंट तत्काल प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया. लेकिन अधिकारी ने जवाब दिया कि यह दस्तावेज़ गुम हो गया है.’ जिस सर्वे पर सरकार ने 160 करोड़ रुपये खर्च किए थे, उसकी मूल रिपोर्ट का इस तरह गायब हो जाना किसी प्रशासनिक लापरवाही से कम नहीं है.
‘वैज्ञानिक तरीका’ बनाम ‘विश्वसनीयता’
हालांकि राज्य के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने संशोधित रिपोर्ट का बचाव करते हुए कहा कि, ‘डेटा वैज्ञानिक तरीके से संकलित किया गया है. इसमें सांख्यिकीय तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है जो जनसंख्या अध्ययन में व्यापक रूप से स्वीकार्य हैं.’
लेकिन समाजशास्त्री डॉ बीएन सविता ने चेताया कि, ‘इस तरह के सैंपल सर्वे एक मोटा अनुमान दे सकते हैं, लेकिन जब मामला जाति आधारित पुनर्संरचना का हो, तो पूर्ण गणना के बिना यह आधार कमजोर पड़ सकता है. यह रिपोर्ट अदालत में चुनौती भी झेल सकती है.’
राहुल गांधी और कांग्रेस लंबे समय से जातिगत जनगणना को लेकर आवाज उठाती रही है. ‘जनगणना कराओ, हक दिलाओ’ जैसे नारे कांग्रेस की नीति का अहम हिस्सा रहे हैं. इस रिपोर्ट के जरिये वे भाजपा को घेरना चाहते थे, लेकिन अब जब यही दस्तावेज़ ही ‘गायब’ है, तो कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक हार बनती दिख रही है.
