February 21, 2026
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माई लॉर्ड… दिल्‍ली हाईकोर्ट में 40% जजों की कमी है.. पीआईएल हुई दाखिल

  • May 8, 2025
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नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के खाली पड़े पदों को लेकर एक अहम जनहित याचिका द्वारा दायर की गई है. याचिका का मुख्य उद्देश्य न्यायिक प्रणाली में

माई लॉर्ड… दिल्‍ली हाईकोर्ट में 40% जजों की कमी है.. पीआईएल हुई दाखिल

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के खाली पड़े पदों को लेकर एक अहम जनहित याचिका द्वारा दायर की गई है. याचिका का मुख्य उद्देश्य न्यायिक प्रणाली में मौजूद नियुक्ति में देरी, उसकी वजह से न्‍यायिक प्रकियाओं में आने वाली दिक्‍कतों को उजागर करना और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के खाली पदों को भरने के लिए केंद्र सरकार और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं को निर्देश दिलवाना है. एडवोकेट और एक्टिविस्ट अमित साहनी की तरफ से यह पीआएल दायर की गई है.

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वकील अमित साहनी ने पीआईएल में कहा है कि अभी दिल्ली उच्च न्यायालय में 60 जजों की स्वीकृत क्षमता है (45 स्थायी एवं 15 अतिरिक्त), लेकिन सिर्फ 36 न्यायाधीश कार्यरत हैं. इस तरह लगभग 40% पद खाली हैं. यह हालात रिटायरमेंट, इंटर स्‍टेट तबादलों एवं समय पर नियुक्तिया न होने की वजह से बनी है.

इसमें कहा गया है कि मार्च–अप्रैल 2025 में न्यायमूर्ति रेखा पल्ली एवं न्यायमूर्ति अनूप कुमार मेहंदीरत्ता के सेवानिवृत्त हुए. मार्च 2025 में जस्टिस यशवंत वर्मा एवं न्यायमूर्ति सी.डी. सिंह का तबादला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तो न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा का कोलकाता उच्च न्यायालय में ट्रांसफर हुआ. वहीं, न्यायमूर्ति धर्मेश शर्मा के जून 2025 तो न्यायमूर्ति शालिंदर कौर के साल के आखिर में सेवानिवृत होने से जजों की संख्या मात्र 34 रह जाएगी.

इसी साल 25 अप्रैल को ही याचिकाकर्ता की तरफ से दिल्‍ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य प्राधिकारियों को पत्र लिखकर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया था.

उनकी तरफ से कहा गया है कि दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के फिलहाल 40 फीसदी पद रिक्त पड़े हैं, जिससे न्यायिक प्रणाली पर अत्यधिक दबाव है. याचिका में आंकड़ों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि रिक्त पदों के कारण लंबित मामलों की संख्या निरंतर बढ़ती रहती है और न्याय में देरी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है. इसी साल दो और जजों की रिटायरमेंट के बाद रिक्त पदों की संख्या 48 फीसदी हो जायेगी, जोकि काफी चिंताजनक है.

याचिका में अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत यह तर्क दिया गया है कि न्याय प्राप्त करना संविधान प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है और जब नागरिक वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते हैं तो यह अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित होता है.

याचिका में यह भी कहा गया है कि कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों को केंद्र सरकार समय पर मंजूरी नहीं दे रही है या उन्हें अनावश्यक रूप से लंबित रख रही है, जिससे न्यायपालिका में नियुक्ति प्रक्रिया बाधित हो रही है और इससे संविधान की मूल भावना, विशेष रूप से न्यायिक स्वतंत्रता, पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

वकील अमित साहनी ने याचिका में यह प्रार्थना की है कि दिल्ली उच्च न्यायालय केंद्र सरकार को यह निर्देश दे कि वह कॉलेजियम की सिफारिशों को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर स्वीकार या अस्वीकार करे. और अगर इसे रिजेक्‍ट करे तो उसके कारणों को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना अनिवार्य किया जाए.

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि अगर न्यायाधीशों की नियुक्ति में इस प्रकार की देरी लगातार जारी रही, तो इससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास डगमगाएगा और ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना है’ की अवधारणा और भी प्रबल होगी.

हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट के जज गिरिश कथपालिया ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरानन्यायालय में जजों की भारी कमी और लंबित मामलों की गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की थी.

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