दिल्लीः भारत विविधता का देश है. पहले तो लगभग भारत के सभी गाव आत्मनिर्भर बनने की राह पर चलते थे. गांव में ही उनके जरूरत की सभी चीजें मिल जाती थी. आज के उपभोक्तावादी इस दौर में भी कुछ परिवार आत्मनिर्भर रहकर जीवन यापन कर रहे हैं. वह अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. जैसलमेर जिले के पोखरण क्षेत्र की फलौदी तहसील के रहने वाले लूणाराम पिछले ढाई दशक से बुनाई का काम कर रहे हैं. उनके साथ करीब 150 परिवार जुड़े हुए हैं, जो पारंपरिक कपड़े, सलवार-कुर्ता से लेकर घर की सजावट तक के सामान तैयार करते हैं. हाथ से होने वाली यह बुनाई न सिर्फ रोज़गार का सहारा है, बल्कि राजस्थान की परंपरा और संस्कृति को जीवित रखने की बड़ी मिसाल भी है.
लूणाराम का 25 साल पुराना सफर
जैसलमेर जिले के पोखरण क्षेत्र की फलौदी तहसील में रहने वाले लूणाराम पिछले 25 सालों से बुनाई के काम में जुटे हुए हैं. उनका मानना है कि यह कला सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि परंपरा और संस्कृति को जिंदा रखने का जरिया भी है. फलौदी में करीब 150 परिवार ऐसे हैं, जो बुनाई के काम से अपनी आजीविका चलाते हैं. ये लोग मिलकर एक समिति के रूप में काम करते हैं और अपनी कारीगरी को आगे बढ़ा रहे हैं. परिवार के सदस्य महिलाएं और पुरुष दोनों इस काम में हिस्सा लेते हैं.
हाथ की कारीगरी का जादू
यहां के बुनकर पारंपरिक वस्त्र जैसे दुपट्टा, ओढ़नी और चादर बनाते हैं. इसके साथ ही समय के साथ उन्होंने नए प्रयोग भी किए हैं. आज वे कुर्ता, सलवार, लेडीज़ ड्रेस और घर की सजावट के लिए कुशन कवर और रनर जैसी चीज़ें भी बना रहे हैं. इन उत्पादों की खासियत यह है कि इनमें पारंपरिक डिजाइन और आधुनिक जरूरतों को सुंदर मेल होता है. ये बुनाई पूरी तरह हाथ से की जाती है, इसलिए इसमें एक अलग ही सुंदरता होती है. मशीन से बने कपड़े भले ही जल्दी तैयार हो जाते हों, लेकिन हाथ से बुने कपड़ों की बात ही कुछ और है. हर धागे में मेहनत, समय और बुनकर की कला झलकती है.
मिला सरकार का सहयोग
इतने बड़े काम को आगे बढ़ाने में मेहनत तो लगती है , लेकिन सरकार की सहायता ज्यादा मायने रखती है. लूणाराम ने बताया कि बुनकर समिति को आयुष विभाग और वस्त्र मंत्रालय से समय-समय पर सहयोग मिलता है. प्रशिक्षण शिविरों और मेलों के जरिए इन उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाया जा रहा है.