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बागेश्वर में आज भी जीवित है पुरानी परंपराएं,जमीन पर बैठाकर खिलाया जाता है खाना

  • May 3, 2025
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Last Updated:May 03, 2025, 18:46 IST Uttarakhand News In Hindi: बागेश्वर के ग्रामीण इलाकों में आज भी पुरानी परंपराएं जीवित हैं, जहां शादी या कार्यक्रमों में मेहमानों को

बागेश्वर में आज भी जीवित है पुरानी परंपराएं,जमीन पर बैठाकर खिलाया जाता है खाना

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Uttarakhand News In Hindi: बागेश्वर के ग्रामीण इलाकों में आज भी पुरानी परंपराएं जीवित हैं, जहां शादी या कार्यक्रमों में मेहमानों को जमीन पर बैठाकर पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं.

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हाइलाइट्स

  • बागेश्वर में आज भी पुरानी परंपराएं जीवित हैं.
  • शादी या कार्यक्रमों में मेहमानों को जमीन पर बैठाकर खिलाया जाता है.
  • पारंपरिक व्यंजन चूल्हों पर घर में ही बनाए जाते हैं.

Uttarakhand Culture: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी पुरानी परंपराएं जीवित हैं, जो आधुनिकता के बावजूद अपनी खास पहचान बनाए हुए हैं. इन्हीं परंपराओं में एक दिलचस्प और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रिवाज है, जिसमें शादी या पारिवारिक कार्यक्रमों में मेहमानों को जमीन पर बैठाकर एक पंक्ति में भोजन कराया जाता है. बागेश्वर के स्थानीय जानकार किशन मलड़ा ने लोकल 18 को बताया कि गांव में जब भी कोई आयोजन होता है, चाहे वह विवाह हो, नामकरण संस्कार हो या कोई अन्य सामूहिक उत्सव, उसमें आने वाले सभी मेहमानों को आंगन या खुले स्थान पर एक सीधी पंक्ति में बैठाया जाता है. यह दृश्य न केवल सामूहिकता की भावना को उजागर करता है, बल्कि पहाड़ी संस्कृति की आत्मीयता और मेहमाननवाजी की झलक भी देता है.

खाने के लिए कैटरिंग का चलन नहीं
यहां खाने के लिए कैटरिंग का चलन नहीं है. खाना किसी ठेकेदार या होटल से नहीं मंगाया जाता, बल्कि पारंपरिक चूल्हों पर घर के आंगन या पास के खुले स्थान में बनाया जाता है. भोजन में पहाड़ी व्यंजन जैसे राजमा की दाल, भट्ट की चुड़कानी, आलू के गुटके और कढ़ी, चावल, पूरी, हलवा, खीर शामिल होते हैं. ये व्यंजन न केवल स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होते हैं. खाना बनाने और परोसने की जिम्मेदारी परिवार या गांव के किसी अनुभवी व्यक्ति को सौंपी जाती है, जो इसे पूरी निष्ठा और विधि-विधान से निभाता है. यह व्यक्ति अक्सर सुबह से उपवास रखता है और पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा धोती, कुर्ता और टोपी पहनकर भोजन तैयार करता है. खाना परोसते समय भी साफ-सफाई और धैर्य का ध्यान रखा जाता है.

परंपरा आज के समय में दुर्लभ होती जा रही
इस तरह के आयोजनों में दिखाई देने वाली आत्मीयता, अनुशासन और परंपरा आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है. बागेश्वर जैसे इलाकों में यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान है, जो लोगों को उनकी जड़ों से जोड़े रखती है. बागेश्वर समेत कई अन्य गांवों में आज भी इस रिवाज को अच्छी तरह निभाया जाता है. पहाड़ के लोगों के लिए यह तरीका अपनी संस्कृति को जीवित रखने जैसा है.

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