January 29, 2026
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फिसलती हुई अलीनगर सीट पर मैथिली हो सकती है BJP की गारंटी

  • October 7, 2025
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Last Updated:October 07, 2025, 13:47 IST Maithili Thakur Entry in Bihar Election: मिथिला की बेटी और देश-विदेश में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने वाली मैथिली ठाकुर बीजेपे

फिसलती हुई अलीनगर सीट पर मैथिली हो सकती है BJP की गारंटी

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Maithili Thakur Entry in Bihar Election: मिथिला की बेटी और देश-विदेश में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने वाली मैथिली ठाकुर बीजेपे में शामिल हो गई हैं और कहा जा रहा है कि उन्हें अलीनगर या बेनीपट्टी विधानसभा सीटों में से किसी एक पर चुनाव मैदान में उतारा जाएगा. ऐसे में अगर वे अलीनगर सीट से चुनावी मैदान में उतरती हैं तो उनके जीतने की कितनी संभावना है. आइए इसका लेखा-जोखा बताते हैं.

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फिसलती हुई अलीनगर सीट पर मैथिली हो सकती है BJP की गारंटीमैथिली ठाकुर का बिहार चुनाव में धमाकेदार एंट्री.

Maithili Thakur Entry in Bihar Chunav: मैथिली ठाकुर किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. अपनी शास्त्रीय आवाज की जादू से वे देश-विदेश में मशहूर हो चुकी है. अब मैथिली ठाकुर उम्र के शुरुआती पड़ाव में ही राजनीति के गलियारों में कूद पड़ी है. बीजेपी नेता विनोद तावड़े से मुलाकात के बाद उन्होंने अलीनगर या बेनीपट्टी में किसी एक सीट पर चुनाव लड़ने की इच्छा प्रकट की है. संभव है उन्हें इन दोनों में से ही किसी एक सीट से लड़ाया जाय. चूंकि मैथिली मिथिला की बेटी मानी जाती है और इसपर वे गर्व भी करती हैं. चूंकि मैथिली ठाकुर बेनीपट्टी की रहने वाली हैं इसलिए उनकी पूरी कोशिश होगी कि वे इसी सीट से चुनाव लड़े लेकिन पार्टी की मंशा अलीनगर से लड़ाने की कहीं अधिक होगी. इसके कई कारण है. यहां हम आपको अलीनगर विधानसभा सीट का पूरा लेखा-जोखा और जातीय समीकरण के बारे में बताएंगे जिनसे आपको सहज ही अंदाजा लग जाएगा कि मैथिली ठाकुर अलीनगर सीट से बीजेपी की किस तरह गारंटी साबित हो सकती हैं.

अलीनगर सीट के पेचीदगियां

मैथिली ठाकुर की अलीनगर सीट पर दावेदारी से पहले अलीनगर को थोड़ा इतिहास जान लेते हैं. अलीनगर विधानसभा सीट का गठन 2008 में हुआ. इससे पहले यह मनीगाछी सीट कहलाती थी. यह सीट एक समय में कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉ. नागेद्र झा का गढ़ माना जाता था. 1977 से 1990 तक इस सीट से डॉ. नागेंद्र झा या उनके बेटे और बाद में बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष बने डॉ. मदन मोहन झा जीतते आ रहे थे लेकिन मंडल कमीशन की लहरों में कांग्रेस पूरे मिथिला क्षेत्र से झटके में सिमट गई और मनीगाछी सीट से राजद के ललित कुमार यादव ने अपना परचम लहरा दिया. माय यानी यादव-मुस्लिम समीकरण के दम पर वे यहां से तीन बार विधायक बने. मनीगाछी से सटी एक और सीट है बेनीपुर जहां से राजद के दिग्गज नेता अब्दुल बारी सिद्दकी उसी तरह जीत रहे थे लेकिन जीतने के बावजूद चुनाव दर चुनाव ललित कुमार यादव और सिद्दकी दोनों का समर्थन कम होता गया. इसी बात के भय से 2008 में सीटों का जब डिलीमिटेशन हुआ तो प्रभावशाली नेता अपने-अपने ढंग से अपनी सीटों पर जातीय समीकरण को मजबूत करने का जुगाड़ बना लिया. नतीजा यह हुआ कि मनीगाछी विधानसभा का आधा हिस्सा दरभंगा ग्रामीण सीट में मिला दिया गया और आधे हिस्से के लिए एक नई सीट अलीनगर बना दी गई जिसमें तारडीह प्रखंड और घनश्याम, मोतीपुर के कुछ हिस्से को मिला दिया गया. इससे अलीनगर में यादव-मुस्लिम और दलित की बहुलता हो गई और अब्दुल बारी सिद्दकी ने इस सीट को अपने लिए सुरक्षित बना लिया. यानी बेनीपुर से लड़ने वाले अब्दुल बारी सिद्दकी अलीनगर से लड़ने लगे और ललित कुमार यादव दरभंगा ग्रामीण से लड़ने लगे. लेकिन जीत का अंतर 5 हजार से नीचे चला आया. इसी गणित को भांपते हुए 2020 में राजद ने अलीनगर से ब्राह्मण उम्मीदवार विनोद मिश्र को टिकट दिया. वे जीते तो नहीं लेकिन पूरे जातीय समीकरण के बुनियादी गणित को ही डांवाडोल कर दिया.

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बीजेपी नेता विनोद तावड़े के साथ मैथिली ठाकुर और उनके पिता.

अलीनगर के लिए मैथिली क्यों जरूरी

2005 विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की राजनीति में मनीगाछी सीट जनता दल यू और उससे पहले समता पार्टी को मिला करती थी. लेकिन बार-बार हारने के कारण 2005 में यह सीट तब गठबंधन में शामिल मुकेश सहनी की पार्टी को मिल गई लेकिन बीजेपी ने इसमें पेंच फंसा दिया. कहा गया कि चूंकि वीआईपी के पास जीतने वाले उम्मीदवार नहीं है, इसलिए इस सीट पर बीजपे का आदमी ही वीआईपी के चुनाव निशान पर चुनाव लड़ेगा. इसके तहत मिश्री लाल यादव को यहां से टिकट दे दिया गया. जीतने के बाद कायदे से वे मुकेश सहनी के आदमी हो गए लेकिन जब मुकेश सहनी को मंत्री पद से हटा दिया गया तो कुछ ही दिनों बाद मिश्री लाल यादव बीजेपी में शामिल हो गए. यहां से यादव को इसलिए उतारा गया क्योंकि यादवों की अच्छी खासी संख्या यहां है. बीजेपी की सोच थी कि राजद के ब्राह्मण उम्मीदवार होने के बावजूद ब्राह्मणों का एकमुश्त मत उसे ही मिलेगा क्योंकि ब्राह्मण समाज लालटेन छाप पर वोट नहीं देगा. दूसरी ओर यादव उम्मीदवार होने के कारण यादवों को वोट भी मिलेगा और हमारा कैंडिडेट जीत जाएगा. यह समीकरण थोड़ा-बहुत काम तो किया और इस दम पर मिश्री लाल यादव मामूली मत से जीत भी गए लेकिन जातीय समीकरण में बीजेपी पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई. अलीनगर सीट पर ब्राह्मणों की आबादी बहुत अधिक है, इसके बावजूद ब्राह्मणों का अधिकांश मत राजद के विनोद मिश्र के खाते में गया.क्योंकि ये यादव उम्मीदवार को वोट करने के पक्ष में नहीं थे. दूसरी ओर यादवों का भी अधिकांश मत विनोद मिश्र के ही खाते में गया. इस तरह 100 फीसदी मुसलमान, आधे ब्राह्मण और आधे यादवों का वोट राजद खाते में चला गया जिसकी कल्पना बीजेपी ने नहीं की होगी. बीजेपी को यही डर सता रहा है कि अगर इस बार मजबूत ब्राह्मण उम्मीदवार को खड़ा नहीं किया तो यह सीट हाथ से निकल जाएगी. चूंकि मैथिली ठाकुर बेहद चर्चित हैं और ब्राह्मण भी हैं और स्थानीय हैं, इसलिए उन्हें लगभग 80 से 90 फीसदी ब्राह्मणों का मत मिलना तय है, दूसरी तरफ ओबीसी और दलित वोटों की अच्छी खासी संख्या उनके खाते में आ सकती है. चूंकि मैथिली बेहद चर्चित हैं, इसलिए वे आस-पड़ोस की सीट पर भी असर डाल सकती है और अन्य जातियों का वोट भी खींच सकती है. इसलिए अलीनगर की फिसलती हुई सीट पर मैथिली ठाकुर बीजेपी की गारंटी साबित हो सकती है.

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