देहरादूनः कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, उत्तराखंड के नेताओं के साथ गुरुवार को नई दिल्ली में मिलने जा रहे हैं. मीटिंग के एजेंडे में यूं तो संगठन और कांग्रेस की भविष्य की स्ट्रेटजी रहेगी. लेकिन एक और बात जिस पर चर्चा हो सकती है वो है कुछ नेताओं की निष्क्रियता. राहुल गांधी ने एक दिन पहले मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं के साथ मुलाकात में “लंगड़े घोड़ों” का जिक्र करके इशारा किया था कि इनएक्टिव नेताओं को किनारा किया जाएगा. ऐसे में उत्तराखंड के नेताओं की जान सूखी हुई है. कांग्रेस में एक बड़ा वर्ग चाहता है कि पार्टी में बरगद के पेड़ों से छुटकारा पाया जाए. कांग्रेस नेता धीरेन्द्र प्रताप, राहुल गांधी की बात से सहमति जताते हैं. धीरेंद्र कहते हैं कांग्रेस में सक्रिय वर्कर्स और नेताओं को आगे बढ़ाने की जरूरत है ताकि पहाड़ी राज्य में बीजेपी का वर्चस्व तोड़ा जाए.
उत्तराखंड में कांग्रेसी परिवार
उत्तराखंड कांग्रेस में 2016 में हुई बड़ी टूट के बाद जो नेता बच गए, उनमें प्रमुख रूप से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, पूर्व मंत्री और स्पीकर रहे यशपाल आर्य और वर्तमान पार्टी अध्यक्ष करण मेहरा ऐसे नाम हैं, जो कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में दखल रखते हैं. इनके अलावा कांग्रेस से बीजेपी और बीजेपी से दोबारा कांग्रेस में लौटे हरक सिंह रावत पार्टी का बड़ा चेहरा हैं. लेकिन बदली परिस्थितियों में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं है. विधानसभा में पार्टी को उपन्यता भुवन कापड़ी उभरते नेताओं में से हैं. वह किसी गुट से ना जुड़कर, अपने आप की न्यूट्रल इमेज प्रोजेक्ट करते रहे हैं. ये कहना गलत नहीं होगा कि गुटबाजी कांग्रेस में इस कदर हावी है कि चाहें नेता एक दूसरे के अगल-बगल बैठे हों, लेकिन उनके दिल आसानी से नहीं मिलते. राहुल गांधी समेत पार्टी के केंद्रीय नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उत्तराखंड के नेताओं को एक साथ कैसे लाएं और राहुल के हिसाब से जो लंगड़े घोड़े हैं उनसे पीछा कैसे छुड़ाएं?
स्वाभाविक नेतृत्व कैसे मिलेगा
उत्तराखंड में कांग्रेस के बड़े नेता हरीश रावत पिछली कुछ दिनों से राजनीतिक तौर पर सक्रिय हुए हैं. राज्य में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. न्यूज़ 18 ने हरीश रावत से जानना चाहा कि क्या वो अगला चुनाव लड़ेंगे. इस पर रावत का कहना था कि उनके चुनाव लड़ने से पार्टी की स्ट्रैटेजी पर फर्क पड़ता है और बीजेपी हावी हो जाती है. इसलिए वो चुनावी राजनीति से किनारा करेंगे. हरीश रावत पार्टी में स्वाभाविक नेतृत्व के उभरने की बात भी करते रहे हैं. ऐसा नेतृत्व जो पार्टी को दिशा दे सके. पर सवाल ये है कि जब नेता ही आपसी खींचतान में फंसे हों तो ऐसे में कौन किसको आगे बढ़ाएगा?
कांग्रेस के ऑप्शन
एक तरफ बीजेपी के मजबूत संगठन से लड़ने की चुनौती, दूसरी तरफ बिखरा कुनबा, इसके बीच पूर्व सीएम हरीश रावत और पूर्व मंत्री यशपाल आर्य की तरफ से गठबंधन का फार्मूला सुझाया गया है. पार्टी के दोनों बड़े नेता मानते हैं की प्रदेश में जो छोटी पार्टियां और दल हैं, उनका अपना थोड़ा-थोड़ा वोट है, जो चुनाव के समय बिखर जाता है और फायदा बीजेपी को मिलता है. वोटों के बिखराव को रोकने के लिए ही छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन का फार्मूला सुझाया गया है. लेकिन केंद्रीय नेतृत्व इस तरह के आइडिया को कैसे लेता है, इस पर आगे की रणनीति डिपेंड करेगी.