February 19, 2026
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एमपी का 'सूखा' सच, यहां बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, 30 साल से नहीं बदली सूरत

  • June 7, 2025
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Last Updated:June 07, 2025, 19:17 IST Ground Report : भोपाल शहर में तो तालाबों और नर्मदा पाइपलाइन से पानी की सप्लाई हो जाती है, लेकिन निपानिया सूखा जैसे

एमपी का 'सूखा' सच, यहां बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, 30 साल से नहीं बदली सूरत

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Ground Report : भोपाल शहर में तो तालाबों और नर्मदा पाइपलाइन से पानी की सप्लाई हो जाती है, लेकिन निपानिया सूखा जैसे दूर-दराज के गांवों में न तो नर्मदा पाइपलाइन पहुंची है और न ही तालाब या नहर का कोई दूसरा जरिया ह…और पढ़ें

एमपी का 'सूखा' सच, यहां बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, 30 साल से नहीं बदली सूरत

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भोपाल से सटे गांव में लोग पानी को तरस रहे हैं.

हाइलाइट्स

  • भोपाल के निपानिया सूखा गांव में पानी की भीषण किल्लत है.
  • गांव में भूजल स्तर 500-700 फीट नीचे चला गया है.
  • ग्रामीणों ने तालाब और नर्मदा पाइपलाइन की मांग की है.

भोपाल. “तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबों का है.” मशहूर कवि अदम गोंडवी की लिखी ये लाइन्‍स मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे गांव ‘निपानिया सूखा’ में पूरी तरह से फिट होती नजर आती हैं. अपने नाम को चरितार्थ करता यह गांव पानी की भीषण किल्लत से जूझ रहा है और पूरी तरह से सूख चुका है. यहां भूजल का स्तर 500 से 700 फीट नीचे चला गया है, जिससे ग्रामीणों का जीवन दूभर हो गया है. गांव में पानी का और कोई जरिया न होने के कारण, सरपंच ही ग्रामीणों के एकमात्र मददगार बने हुए हैं, जो अपने कुएं से टंकी भरकर पूरे गांव को पानी पिलाते हैं.

भोपाल और उसके आसपास के इलाकों में भूजल की स्थिति अब सेमी-क्रिटिकल स्तर पर पहुंच गई है. निपानिया सूखा में एक मात्र टंकी के भरोसे पूरा गांव अपनी प्यास बुझाता है. इस टंकी के आसपास हर दिन बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे अपने पानी के कुप्पे और मटके लेकर घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, अपनी बारी का इंतजार करते हैं. पानी मिलने के बाद, वे सिर पर भारी वजन लादकर ऊंची-नीची पगडंडियों से होते हुए अपने घरों तक जाते हैं. सरपंच के कुएं से आने वाले इसी पानी से ग्रामीण अपनी प्यास बुझाते हैं, नहाते हैं और अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करते हैं.

घरों तक सिर्फ पाइप ही पहुंचे, पानी नहीं आया
पानी भर रही महिलाओं ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि यह दर्द आज का नहीं है, बल्कि पिछले 30 सालों से यहां यही हालात हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि इस समस्या की सुध लेने कोई नहीं आता. गाँव के कई लोग तो पानी की कमी के चलते हफ्ते में सिर्फ एक दिन ही नहा पाते हैं. यह स्थिति उस मध्य प्रदेश की है जो कभी खुद को आत्मनिर्भर और कृषि कर्मण अवार्ड विजेता बताता रहा है. गांव में नल-जल योजना की शुरुआत करीब 6 साल पहले हुई थी, लेकिन विडंबना यह है कि अब तक घरों तक सिर्फ पाइप ही पहुंचे हैं; न तो उनमें पानी आया है और न ही टोंटियां लगी हैं.

पानी की किल्लत से प्रभावित खेती और अर्थव्यवस्था
कृषि कर्मण अवार्ड जीत चुके मध्य प्रदेश की राजधानी से सटे इस गांव में पानी की भीषण किल्लत के कारण खेती-किसानी भी बुरी तरह प्रभावित है. निपानिया सूखा में पानी की कमी के चलते साल में सिर्फ एक फसल ही होती है, और वह भी पूरी तरह से बारिश के भरोसे. किसान बताते हैं कि दो एकड़ के खेत में वे पांच-पांच बोरवेल करवा चुके हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर या तो फेल हो जाते हैं, या फिर अगर पानी आता भी है तो वह 500-600 फीट की गहराई पर मिलता है. ऐसी स्थिति में किसानों के लिए मुनाफा कमाना तो दूर की बात है, उनकी लागत भी निकल जाए तो बहुत है. यह स्थिति ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा नकारात्मक प्रभाव डाल रही है.

तेजी से गिरता भूजल स्तर और भविष्य की चिंता
भोपाल में भूजल की स्थिति को लेकर हाल ही में सामने आईं कुछ रिपोर्टों की मानें तो जिले के 96 प्रतिशत हिस्से में तुरंत रिचार्ज की जरूरत है. रिपोर्ट के अनुसार, जिले के 80 प्रतिशत इलाकों में भूजल का ही अत्यधिक दोहन हो रहा है. सबसे ज्यादा पानी खेती के लिए, उसके बाद दैनिक दिनचर्या और फिर उद्योगों के लिए इस्तेमाल हो रहा है. भोपाल के फंदा ब्लॉक में 80%, बैरसिया में 78% और भोपाल अर्बन में 77% के करीब भूजल का इस्तेमाल होता है. यही वजह है कि भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है और अब लोग पीने के पानी के लिए भी तरस रहे हैं.

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एमपी का ‘सूखा’ सच, यहां बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, 30 साल से नहीं बदली सूरत

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