Uddhav Thackeray Raj Thackeray Reunion: महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले पांच सालों में एक अलग ही तरह की खिचड़ी पकी हुई है. शिवसेना और एनसीपी पूरी तरह टूट चुकी हैं. एक गुट बीजेपी के महायुति गठबंधन तो दूसरा कांग्रेस के महा विकास अघाड़ी के साथ है. इसी बीच उद्धव ठाकरे और चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ आने की चर्चाओं ने महाराष्ट्र की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है. ऐसा होना लाजमी भी क्योंकि एकनाथ शिंदे के हाथों उद्धव अपना सबकुछ गंवाते नजर आ रहे हैं. वहीं, शिवसेना में अहम की लड़ाई के बाद साल 2006 में अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन करने वाले राज ठाकरे की स्थिति भी प्रदेश की राजनीति में खास अच्छी नहीं है. हाल ही में राज ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र के हित के लिए वे उद्धव की शिवसेना (UBT) के साथ गठबंधन को तैयार हैं, बशर्ते इच्छा हो. उधर, उद्धव ने भी जवाब दिया कि मराठी मानुष के लिए सभी मराठी लोग एकजुट हों, लेकिन उनकी शर्त है कि गठबंधन सिद्धांतों पर आधारित हो, अवसरवादी नहीं.
अब बड़ा सवाल यह है कि एक वक्त में महाराष्ट्र की राजनीति में कद्दावर नेता रहे उद्धव और राज ठाकरे क्या सच में साथ आ सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो ठाकरे फैमिली में रीयूनियन हो जाएगा, लेकिन इस थ्योरी में कई पेच भी नजर आते हैं. जानकार मानते हैं कि ऐसा होना बेहद मुश्किल है. एकनाथ शिंदे गुट के संजय सिरसात महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी हैं. उन्होंने कहा कि दोनों कभी भी एक साथ नहीं आएंगे और यह पॉसिबल नहीं है! अगर इन दोनों की मेल होता भी है तो क्या उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी के साथ छोड़ेंगे? अगर उद्धव ठाकरे आते हैं तो क्या राज ठाकरे कांग्रेस एनसीपी के साथ जाएंगे. राज ठाकरे कभी भी कांग्रेस एनसीपी के साथ नहीं जाएंगे और उद्धव ठाकरे भी कभी भी एनसीपी कांग्रेस को नहीं छोड़ेंगे. तो यह साफ है कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का गठबंधन होना बहुत मुश्किल है.
उद्धव पर भरोसा कैसे करें: MNS
उधर, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुंबई अध्यक्ष संदीप देशपांडे ने शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ गठबंधन की चर्चाओं के बीच उन पर भरोसा न करने की बात कही और पिछले अनुभवों का हवाला देते हुए उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए. संदीप देशपांडे ने कहा, “साल 2012 और 2014 में हमने उद्धव ठाकरे का समर्थन किया. हम अपना ए-बी फॉर्म रोककर उनके साथ खड़े हुए, लेकिन उद्धव जी ने हमारा फोन तक नहीं उठाया. साल 2017 में भी गठबंधन की चर्चा हुई, तब भी उन्होंने यही रवैया अपनाया. मनसे ने पहले भी उद्धव ठाकरे का समर्थन किया, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी. वह पहले भाजपा की आलोचना करते थे, फिर उनके साथ चुनाव लड़े और बाद में शरद पवार और कांग्रेस के साथ चले गए. अब शायद उन्हें महा विकास आघाड़ी (एमवीए) में अपनी गलती का अहसास हुआ है, लेकिन क्या उन पर भरोसा किया जा सकता है?”
मनसे को BJP से दूर रहने की सलाह पर…
देशपांडे ने उद्धव ठाकरे की नैतिकता पर भी सवाल उठाते हुए कहा, “जो लोग हमारे साथ शर्तें रखने की बात करते हैं, क्या उनकी नैतिकता बची है? जिन्हें वे अब महाराष्ट्र का दुश्मन कहते हैं, क्या वे पहले दुश्मन नहीं थे? अगर उद्धव ठाकरे ढाई साल तक मुख्यमंत्री रहे होते तो क्या भाजपा उनकी दुश्मन होती?” उन्होंने यह भी कहा कि उद्धव ठाकरे ने एमवीए से बाहर आने के सवाल पर कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन मनसे को बीजेपी से दूर रहने की सलाह दी. ऐसे लोगों पर भरोसा कैसे करें? देशपांडे ने साफ किया कि उनकी पार्टी ने हमेशा अपने दम पर चुनाव लड़ा है और किसी के सामने झुकी नहीं. बिना चुनाव के भी अगर कोई सामान्य मुद्दा हो, तो हम साथ आ सकते हैं, लेकिन उद्धव ठाकरे पर भरोसा करना मुश्किल है. हमारी जीभें पहले ही जल चुकी हैं.
दोनों भाईयों को बात करनी चाहिए…
महाराष्ट्र विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष शिवसेना (यूबीटी) के अंबादास दानवे ने पार्टी के मनसे के साथ आने की कयासबाजी पर शनिवार को कहा कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की राजनीति अलग है. दानवे ने कहा, “दोनों भाई हैं, लेकिन उनकी राजनीति अलग-अलग है. यदि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे को एक साथ आना है, तो उन्हें आपस में बैठकर बात करनी होगी. यह चर्चा टीवी पर नहीं, बल्कि निजी तौर पर होनी चाहिए.”